दुमका जिले के काठीकुंड बाजार स्थित जनप्रिय दुर्गा मंदिर में पूजा की एक पुरानी व्यवस्था आज भी कायम है। मंदिर के लिए निर्धारित कृषि भूमि पर होने वाली फसल से प्राप्त आमदनी का इस्तेमाल दुर्गा पूजा और उससे जुड़ी आवश्यक तैयारियों में किया जाता है। खेत की उपज इस धार्मिक आयोजन के नियमित संचालन का आधार बनी हुई है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, क्षेत्र के मंडल समाज के एक संपन्न परिवार ने वर्षों पहले मंदिर का निर्माण कराकर यहां दुर्गा पूजा शुरू की थी। पूजा लगातार आयोजित होती रहे और उसके खर्च की व्यवस्था बनी रहे, इसके लिए परिवार की ओर से कृषि भूमि उपलब्ध कराई गई थी। उसी जमीन की उपज से होने वाली आय पूजा पर खर्च की जाती रही है।
इस व्यवस्था को संभालने के लिए परिवार के सदस्यों के बीच बारी तय की गई है। अपनी पाली आने पर संबंधित सदस्य पूजा के लिए निर्धारित भूमि की उपज और उससे प्राप्त आमदनी का प्रबंधन करते हैं। समय के साथ पूजा का स्वरूप बदला है, लेकिन खेत की आय को आयोजन में लगाने की मूल परंपरा जारी है।
अब आयोजन की सजावट, रोशनी, रंगरोगन और दूसरी व्यवस्थाओं को बेहतर ढंग से संचालित करने के लिए जनप्रिय दुर्गा पूजा समिति भी गठित की गई है। मंगलवार को मंदिर परिसर में हुई समिति की बैठक में आगामी दुर्गा पूजा की तैयारियों और आयोजन से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई।
बैठक में इस वर्ष पूजा के लिए करीब 2.50 लाख रुपये का बजट निर्धारित किया गया। इस राशि से मंदिर का रंगरोगन, मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण, आकर्षक लाइट डेकोरेशन और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं करने पर विचार हुआ। समिति ने आयोजन को पहले से बेहतर स्वरूप देने की तैयारी की है।
समिति में आशीष कुमार दे को अध्यक्ष, जितेंद्र पाल को सचिव और प्रशांत कुमार दत्ता को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। अन्य सदस्य भी आयोजन की तैयारियों में सहयोग करेंगे। परिवार द्वारा शुरू की गई कृषि-आधारित व्यवस्था अब जनसहयोग और समिति के प्रबंधन के साथ आगे बढ़ रही है तथा मंदिर की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई है।