गुवाहाटी की राष्ट्रीय कार्यशाला में झारखंड के छह शिक्षकों ने दिखाई राज्य की सांस्कृतिक विरासत

जेसीईआरटी से चयनित छह शिक्षकों ने 18 राज्यों के प्रतिभागियों के सामने बिरसा मुंडा की गाथा, लोकगीत, पर्व, कला, खान-पान और पारंपरिक उत्पादों का परिचय दिया।

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गुवाहाटी की राष्ट्रीय कार्यशाला में झारखंड की संस्कृति प्रस्तुत करते चयनित शिक्षक

रांची से चयनित झारखंड के छह शिक्षक असम के गुवाहाटी में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में राज्य की संस्कृति और विरासत को देशभर के प्रतिभागियों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र में पांच अक्तूबर से शुरू हुई दस दिवसीय कार्यशाला में 18 राज्यों के कुल 159 प्रतिभागी शामिल हैं। शिक्षकों का चयन झारखंड शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (जेसीईआरटी), रांची ने किया है।

गुरुवार को हुई प्रस्तुति में झारखंड की भौगोलिक और आर्थिक विशेषताओं के साथ लोककला, पर्व-त्योहार, पारंपरिक खान-पान और वेशभूषा की जानकारी साझा की गई। आरके उच्च विद्यालय बघिमा, पालकोट के नागपुरी शिक्षक रविंद्र साहू ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से राज्य का परिचय दिया और बिरसा मुंडा को समर्पित लोकगीत पेश किया।

पूर्वी सिंहभूम के उच्च विद्यालय आसबनी के शिक्षक अजीत कुमार महतो ने झारखंड के भौगोलिक एवं आर्थिक परिदृश्य पर जानकारी दी। पश्चिमी सिंहभूम के पीएम श्री उच्च विद्यालय रोलाडीह के शिक्षक जोसेफ टोपनो ने सोहराय और कोहबर कला के अलावा राज्य के भोजन और पारंपरिक पहनावे से प्रतिभागियों को परिचित कराया।

गुमला के राजकीयकृत उत्क्रमित उच्च विद्यालय तबला चैनपुर के शिक्षक सिकंदर साहू ने बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव और परमवीर अल्बर्ट एक्का के त्याग तथा बलिदान का उल्लेख किया। उनकी प्रस्तुति के माध्यम से कार्यशाला में शामिल लोगों को झारखंड के ऐतिहासिक नायकों और जनजातीय संघर्ष की परंपरा की जानकारी मिली।

सोनाहातू के उत्क्रमित मध्य विद्यालय चोगा की सहायक शिक्षिका शशि हेम्ब्रम ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत में झारखंड की विशिष्ट पहचान और राज्य की उपलब्धियों को रेखांकित किया। उन्होंने जीआई टैग प्राप्त मांदर, प्राकृतिक सब्जी रूगड़ा और कुचाई सिल्क समेत पारंपरिक उत्पादों के संरक्षण और संवर्धन से जुड़ी जानकारी भी साझा की।

नामकुम के राजकीयकृत उत्क्रमित उच्च विद्यालय बुंडू बेड़ा की सहायक शिक्षिका रामेश्वरी सिंह ने सरहुल और करम पर्व के साथ झारखंड के लोकगीतों तथा लोकनृत्यों की झलक पेश की। उन्होंने पद्मश्री मधु मंसूरी हंसमुख के गीतों की प्रस्तुति दी। अलग-अलग जिलों से पहुंचे शिक्षकों की सहभागिता ने राष्ट्रीय मंच पर झारखंड की कला, इतिहास, जीवनशैली और सांस्कृतिक विविधता को एक साथ सामने रखा।