चतरा शहर के जतराहीबाग में एक बंगाली परिवार 77 वर्षों से दुर्गापूजा की पारंपरिक विधियों को सहेजे हुए है। परिवार हर साल अपने घर में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करता है और बंगाल की पूजा-पद्धति के अनुसार आराधना करता है। बदलते समय के बीच भी परिवार की नई पीढ़ियां इस धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।
इस आयोजन की सबसे प्रमुख रस्म विजयादशमी पर होने वाला सिंदूर उत्सव है। परिवार की सुहागिन महिलाएं पहले मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर उसे अपनी मांग में लगाती हैं। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।
पूजा को पारंपरिक स्वरूप देने के लिए मां दुर्गा की प्रतिमा भागलपुर से मंगाई जाती है। पूजा संपन्न कराने के लिए गयाजी से पंडित पहुंचते हैं। परिवार के सदस्य बिना दिखावे के आयोजन करने और पुराने विधि-विधान को उसी रूप में बनाए रखने पर जोर देते हैं।
ढाक की थाप और धुनुचि नृत्य भी इस घरेलू दुर्गापूजा के विशेष आकर्षण हैं। संध्या आरती के दौरान परिवार के सदस्य और श्रद्धालु धुनुचि नृत्य में भाग लेते हैं। ढाक की लय, आरती और सामूहिक उपासना के कारण परिसर में बंगाली संस्कृति की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।
विजयादशमी की रस्म और पूजा देखने के लिए आसपास के लोग भी जतराहीबाग पहुंचते हैं। इससे आयोजन केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए सांस्कृतिक मेलजोल का अवसर भी बनता है। श्रद्धालुओं की भागीदारी धार्मिक आस्था के साथ अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जुड़ाव को सामने लाती है।
सात दशक से अधिक समय से जारी यह आयोजन चतरा में बंगाली सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की स्थानीय मिसाल है। परिवार ने प्रतिमा स्थापना, पारंपरिक पूजा, ढाक, धुनुचि नृत्य और सिंदूर उत्सव जैसी परंपराओं को एक साथ कायम रखा है। इन्हीं रीति-रिवाजों के माध्यम से पुरानी पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक स्मृतियां अगली पीढ़ी को सौंप रही है।