जालान रोड और अपर बाजार की दुकानों पर नगर निगम के आदेश रद्द, हाईकोर्ट ने दोबारा सुनवाई का दिया निर्देश

झारखंड हाईकोर्ट ने दुकानों के लाइसेंस रद्द करने और उन्हें खाली कराने के पुराने आदेश निरस्त कर दिए। नगर निगम को दस्तावेजों पर विचार कर 12 सप्ताह में नया कारणयुक्त आदेश देना होगा।

2 मिनट पढ़ें 6 बार पढ़ी गई
रांची के जालान रोड और अपर बाजार की दुकानों से जुड़े मामले पर झारखंड हाईकोर्ट का निर्णय

रांची के जालान रोड और अपर बाजार की दुकानों से जुड़े विवाद में झारखंड हाईकोर्ट ने नगर निगम के पुराने आदेशों को निरस्त कर दिया है। इन आदेशों के तहत दुकानों के लाइसेंस रद्द करने और उन्हें खाली कराने को कहा गया था। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने मामले से संबंधित आठ रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के बाद यह निर्णय दिया।

अदालत ने रांची नगर निगम को याचिकाकर्ताओं का पक्ष सुनने और उनके दस्तावेजों पर विचार करने का निर्देश दिया है। निगम को सुनवाई की प्रक्रिया पूरी कर 12 सप्ताह के भीतर नया और कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा। तब तक याचिकाकर्ताओं का दुकानों पर कब्जा प्रभावित नहीं होगा।

याचिकाओं में नगर निगम के 14 अक्टूबर 2014 के लाइसेंस रद्द करने के आदेश, 4 दिसंबर 2014 के दुकान खाली कराने के निर्देश और 13 फरवरी 2015 के आदेश को चुनौती दी गई थी। विवादित भूमि जालान रोड पर 5100 वर्गफीट की बताई गई है, जिसे 1966-67 में तत्कालीन रांची नगरपालिका ने मोहन लाल कच्ची को आवंटित किया था। वहां टेंट हाउस का व्यवसाय चलता था।

बाद में उनके उत्तराधिकारी महेंद्र कुमार कच्ची ने कुछ अन्य लोगों के साथ साझेदारी में कारोबार शुरू किया। साझेदारी समाप्त होने के बाद भूमि के पुनः आवंटन का अनुरोध किया गया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, नगर निगम ने दिसंबर 2003 में जमीन प्रार्थियों के नाम आवंटित की और जून 2004 में लाइसेंस शुल्क के आधार पर समझौता किया। स्थायी निर्माण की अनुमति भी अगस्त 2004 में दी गई थी।

नगर निगम का पक्ष था कि दुकानदारों ने लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन किया और मामला दुकानों को दूसरे पक्ष को सौंपने से जुड़ा है। निगम ने यह भी कहा कि संबंधित जमीन पर विकास कार्य की आवश्यकता है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उनके जवाब और दस्तावेजों पर समुचित विचार किए बिना लाइसेंस रद्द कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने पाया कि अक्टूबर 2014 का आदेश केवल तीन पंक्तियों का था और उसमें याचिकाकर्ताओं की दलीलों तथा दस्तावेजों का विचार दिखाई नहीं देता। फरवरी 2015 के आदेश में भी तथ्यों पर पर्याप्त विचार नहीं पाया गया। अदालत ने कहा कि वैधानिक प्राधिकार को संबंधित तथ्यों और अभिलेखों पर विचार करने के बाद ही निर्णय देना चाहिए। अब नगर निगम को इसी कसौटी पर मामले की दोबारा सुनवाई करनी होगी।