झारखंड आवास बोर्ड ने फ्री होल्ड व्यवस्था खत्म करने का प्रस्ताव सरकार को भेजा

आवास बोर्ड ने जमीन और मकानों के लिए फ्री होल्ड की जगह लीज होल्ड व्यवस्था अपनाने का प्रस्ताव दिया है। प्रस्ताव अभी राज्य सरकार के विचाराधीन है।

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रांची स्थित झारखंड राज्य आवास बोर्ड से संबंधित प्रतिनिधि दृश्य

झारखंड राज्य आवास बोर्ड ने अपनी जमीन और मकानों को फ्री होल्ड करने की व्यवस्था समाप्त कर दोबारा लीज होल्ड प्रणाली अपनाने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा है। इस पर अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है और प्रस्ताव सरकार के स्तर पर विचाराधीन है। बोर्ड ने करीब आठ महीने से संपत्तियों को फ्री होल्ड करने की प्रक्रिया पर अघोषित रोक भी लगा रखी है।

बोर्ड का तर्क है कि फ्री होल्ड व्यवस्था उसके हित में नहीं है। बोर्ड के अनुसार, संपत्ति का पूरा मालिकाना हक मिलने के बाद कुछ स्थानों पर निर्धारित प्रकृति से अलग व्यावसायिक उपयोग और नियमों के विपरीत निर्माण की शिकायतें सामने आई हैं। इस संबंध में विभाग को जानकारी दी गई है।

झारखंड में यह व्यवस्था वर्ष 2019 में तत्कालीन राज्य सरकार ने बिहार की नीति के आधार पर लागू की थी। इसका उद्देश्य पुराने लीजधारकों को जमीन या मकान का मालिकाना हक देना था, ताकि वे संपत्ति की रजिस्ट्री और हस्तांतरण कर सकें। इसके लिए बाजार दर की 10 प्रतिशत राशि परिवर्तन शुल्क के रूप में लेने का प्रावधान था।

फ्री होल्ड में संपत्ति का मालिकाना हक लीजधारक को मिल जाता है और हस्तांतरण के लिए बोर्ड की अनुमति की आवश्यकता नहीं रहती। इसके विपरीत लीज होल्ड व्यवस्था में बोर्ड मूल मालिक बना रहता है। लीजधारक को सामान्यतः 99 वर्षों के लिए उपयोग का अधिकार मिलता है, जबकि संपत्ति हस्तांतरित करने के लिए बोर्ड की अनुमति और निर्धारित राशि का भुगतान जरूरी होता है।

आवास बोर्ड की कई संपत्तियों पर कब्जे और बकाया भुगतान का प्रश्न भी लंबित है। लंबे समय से काबिज लोगों को निर्धारित दर पर संपत्ति अपने नाम कराने का विकल्प दिया गया था, लेकिन अधिक राशि के कारण कई मामलों में रजिस्ट्री नहीं हो सकी। कुछ आवंटियों की देनदारी नियमित भुगतान नहीं होने और उस पर ब्याज जुड़ने से बढ़ी है, जिससे वे अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं ले सके हैं।

बोर्ड प्रबंधन के मुताबिक, जिन लोगों को जमीन फ्री होल्ड करने की अनुमति पहले ही दी जा चुकी है, प्रस्तावित बदलाव से उन्हें परेशानी नहीं होगी। हालांकि नई व्यवस्था लागू होगी या मौजूदा नीति जारी रहेगी, यह राज्य सरकार के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा। इसलिए फिलहाल इसे लागू फैसला नहीं, बल्कि आवास बोर्ड की ओर से भेजे गए प्रस्ताव के रूप में देखा जाना चाहिए।