झारखंड की पुलिस महानिदेशक तदाशा मिश्रा की नियुक्ति से जुड़ा मामला फिर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचा है। केंद्र सरकार ने झारखंड सरकार और अन्य के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग वाली याचिका दायर की है। अदालत ने इसे 8 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है।
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने मामला रखा। उन्होंने अवमानना याचिका को मिश्रा की नियुक्ति से संबंधित पहले से लंबित दूसरी याचिकाओं के साथ सुनने का अनुरोध किया, जिसे पीठ ने स्वीकार कर लिया।
लंबित याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि डीजीपी की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं हुई। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, झारखंड सरकार ने 30 दिसंबर 2025 को मिश्रा को डीजीपी नियुक्त किया था, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति अगले दिन 31 दिसंबर को निर्धारित थी। इसी शेष सेवा अवधि को मामले का प्रमुख प्रश्न बताया गया है।
अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने पहले कहा था कि नियुक्ति के समय संबंधित अधिकारी की कम से कम छह महीने की सेवा बाकी रहने संबंधी निर्देश का पालन नहीं हुआ। यह पक्ष अभी न्यायिक विचार के अधीन है और नियुक्ति की वैधता पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना है।
डीजीपी चयन से जुड़े निर्देशों का आधार 2006 का प्रकाश सिंह फैसला और उसके बाद दिए गए आदेश हैं। इनके अनुसार राज्य सरकार को संघ लोक सेवा आयोग के पैनल में शामिल तीन वरिष्ठ अधिकारियों में से चयन करना होता है। पैनल तैयार करते समय सेवाकाल, सेवा रिकॉर्ड और पुलिस बल का नेतृत्व करने के अनुभव जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है।
निर्देशों में चयनित अधिकारी के लिए दो वर्ष के न्यूनतम कार्यकाल का प्रावधान भी बताया गया है, भले ही उसकी सामान्य सेवानिवृत्ति की तारीख पहले हो। अब 8 अक्टूबर की सुनवाई में अदालत के सामने नियुक्ति प्रक्रिया, शेष सेवा अवधि और न्यूनतम कार्यकाल से जुड़े इन्हीं प्रश्नों पर विचार होने की संभावना है।