रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने कल्याण विभाग के 13 चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों के प्रमोशन से जुड़े मामले में राहत दी है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने कर्मचारियों का दावा खारिज करने वाले 30 अक्टूबर 2020 के विभागीय आदेश को रद्द कर दिया। संबंधित अधिकारियों को अभिलेखों की जांच कर आठ सप्ताह के भीतर आवश्यक निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है।
अदालत के अनुसार, तृतीय श्रेणी के पदों पर प्रमोशन के लिए सीमित प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित नहीं होने की स्थिति में केवल परीक्षा कराने की मांग भेजे जाने के आधार पर दावा नहीं रोका जा सकता। रिकॉर्ड में सामने आया कि विभाग ने वर्ष 2019 में परीक्षा के लिए मांग भेजी थी, लेकिन उसके बाद परीक्षा आयोजित नहीं हुई।
सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की ओर से बताया गया कि ऑनलाइन परीक्षा कराने की प्रक्रिया वर्ष 2026 में पहली बार तय की गई। राज्य सरकार ने भी वर्ष 2019 में मांग भेजे जाने के बाद सीमित प्रतियोगिता परीक्षा नहीं होने की बात से इनकार नहीं किया। अदालत ने वर्षों तक प्रक्रिया तय नहीं होने की परिस्थिति पर भी विचार किया।
कर्मचारियों ने अपनी याचिका में दावा किया था कि कल्याण विभाग में समान स्थिति वाले दूसरे कर्मियों को प्रमोशन मिल चुका है। उन्होंने विभाग में विभिन्न पद रिक्त होने की बात भी रखी। उनके अनुसार, प्रमंडल कार्यालयों में टाइपिस्ट के 10, आवासीय विद्यालयों में 62 और प्रखंड कल्याण कार्यालयों में 118 पद खाली हैं।
यह मामला पहले भी हाईकोर्ट पहुंचा था। याचिका संख्या 1811/2018 पर पांच नवंबर 2018 को सुनवाई के बाद कर्मचारियों को संबंधित अधिकारियों के समक्ष नया अभ्यावेदन देने की छूट मिली थी। संयुक्त अभ्यावेदन पर विभाग ने अक्टूबर 2020 में कहा था कि नियुक्ति या प्रमोशन के लिए कर्मचारी चयन आयोग को मांग भेजी जा चुकी है और इसी आधार पर दावा अस्वीकार कर दिया था।
अब अदालत ने अधिकारियों से प्रत्येक संबंधित कर्मचारी का रिकॉर्ड और निर्धारित पात्रता शर्तें जांचने को कहा है। योग्य पाए जाने वाले कर्मचारियों के प्रमोशन का औपचारिक आदेश आठ सप्ताह में जारी करना होगा। आदेश का लाभ स्वतः प्रमोशन के रूप में नहीं, बल्कि रिकॉर्ड और पात्रता की जांच के बाद मिलने वाले निर्णय के आधार पर होगा।