पलामू में चार दशक से दुर्गा प्रतिमाएं बना रहा बंगाल का कलाकार परिवार, पूजा सीजन से मिलता है रोजगार

पश्चिम बंगाल से आने वाले लोखी नारायण सूत्रधर और उनकी चार सदस्यीय टीम पलामू में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाएं तैयार करती है। यह सिलसिला करीब 40 वर्षों से जारी है।

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पलामू के लठैया में दुर्गा प्रतिमाओं को अंतिम रूप देते पश्चिम बंगाल के कलाकार

पलामू जिले में दुर्गा पूजा की तैयारियों के बीच पश्चिम बंगाल से आए मूर्तिकार प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। नावा बाजार, छतरपुर, लठैया और सुल्तानी सहित कई क्षेत्रों में पंडाल निर्माण का काम चल रहा है। इसी क्रम में कलाकारों की कार्यशालाओं में मिट्टी से बनी देवी प्रतिमाओं पर रंग, आभूषण और सजावट की जा रही है।

मूर्तिकार लोखी नारायण सूत्रधर के अनुसार, उनका परिवार पीढ़ियों से इस कला से जुड़ा है। उन्होंने करीब चार दशक पहले पलामू में प्रतिमा निर्माण शुरू किया था। इसके बाद से उनका परिवार हर साल पूजा के मौसम में पश्चिम बंगाल से यहां आता है। उनके साथ मनोज कुमार समेत चार सदस्यों की टीम अलग-अलग स्थानों पर काम करती है।

फिलहाल यह टीम लठैया स्थित कंडा देवी मंदिर और महावीर मंदिर परिसर में प्रतिमाएं तैयार कर रही है। मिट्टी से आकृति बनाने का काम पूरा होने के बाद रंग और बारीक सजावट का चरण चल रहा है। पूजा समितियां भी निर्माण की प्रगति देख रही हैं, ताकि दशहरा से पहले प्रतिमाओं को निर्धारित पूजा स्थलों तक पहुंचाया जा सके।

सूत्रधर ने बताया कि उनकी टीम दुर्गा पूजा के दौरान करीब 10 से 12 प्रतिमाएं बनाती है। इससे लगभग एक लाख से डेढ़ लाख रुपये तक की आमदनी होती है। दुर्गा पूजा के बाद भी काम जारी रहता है और कलाकार लक्ष्मी तथा सरस्वती पूजा के लिए प्रतिमाएं तैयार करते हैं।

कलाकारों के मुताबिक, लक्ष्मी पूजा के लिए करीब 30 प्रतिमाएं बनाने से लगभग 1.20 लाख रुपये की आय होती है। सरस्वती पूजा के दौरान मांग और बढ़ जाती है। उस समय टीम करीब 60 प्रतिमाएं तैयार करती है और इससे लगभग दो लाख रुपये तक की कमाई होती है। पूजा का मौसम समाप्त होने पर कलाकार पश्चिम बंगाल लौट जाते हैं।

लोखी नारायण सूत्रधर ने बताया कि वर्ष के दूसरे हिस्सों में वे सीमेंट की मूर्तियां बनाने के साथ घरों में पुट्टी और रंग-रोगन का काम भी करते हैं। इन कामों से परिवार का भरण-पोषण चलता है। पूजा के मौसम में पलामू आकर प्रतिमाएं बनाना उनके लिए आय का महत्वपूर्ण साधन होने के साथ पीढ़ियों से मिली कला को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है।