पुलिस जांच में देरी या उसके तौर-तरीके से असंतुष्ट शिकायतकर्ता को सीधे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने के बजाय पहले कानून में उपलब्ध दूसरे उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए। झारखंड हाईकोर्ट ने साहिबगंज जिले से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह बात स्पष्ट की।
बरहरवा निवासी सुमन कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर राजमहल थाने में दर्ज मामले की निष्पक्ष और उचित जांच शीघ्र पूरी कराने की मांग की थी। उन्होंने पुलिस को आरोपपत्र दाखिल करने का निर्देश देने का आग्रह भी अदालत से किया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का संदर्भ देते हुए याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उचित मंच पर अपनी शिकायत रखने की स्वतंत्रता दी गई है।
अदालत के अनुसार, पुलिस जांच में लापरवाही या समुचित कार्रवाई नहीं होने की शिकायत सबसे पहले संबंधित पुलिस अधीक्षक अथवा अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सामने रखी जा सकती है। इस स्तर पर समाधान नहीं मिलने की स्थिति में शिकायतकर्ता संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट की अदालत में आवेदन दे सकता है।
फैसले में बताया गया कि मजिस्ट्रेट के पास पुलिस को जांच का निर्देश देने और कानूनी दायरे में उसकी निगरानी करने की शक्ति होती है। शिकायतकर्ता संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आपराधिक शिकायत भी दाखिल कर सकता है।
अदालत की टिप्पणी का आशय यह है कि जांच से संबंधित शिकायतों के लिए उपलब्ध वैधानिक प्रक्रिया और सक्षम अधिकारियों के स्तर का पहले उपयोग किया जाए। साहिबगंज के इस मामले में हाईकोर्ट ने जांच के गुण-दोष पर कोई निष्कर्ष देने के बजाय याचिकाकर्ता को वैकल्पिक कानूनी मंच अपनाने की छूट दी।