पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा वन क्षेत्र में 31 हजार हेक्टेयर से अधिक वनभूमि पर वन्यजीव अभयारण्य विकसित करने की पहल की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर आगे बढ़ रही इस योजना में जैव विविधता के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार से 37 करोड़ रुपये की सहायता मिलेगी।
प्रस्तावित क्षेत्र में लगभग 89 प्रकार की वनस्पतियां होने की जानकारी दी गई है। वनस्पतियों और वन्यजीवों को सुरक्षित रखने के लिए विशेषज्ञों की नियुक्ति तथा जरूरी संसाधनों की व्यवस्था की जानी है। राज्य सरकार ने इस संबंध में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से आवश्यक दिशा-निर्देश मांगे हैं।
योजना में सारंडा के आसपास रहने वाले लोगों की भागीदारी पर भी जोर दिया गया है। केंद्रीय सहायता से उन्हें जैव विविधता संरक्षण से जुड़े कार्यों का प्रशिक्षण देने की तैयारी है। इसका उद्देश्य स्थानीय समुदायों को संरक्षण गतिविधियों से जोड़ना और क्षेत्र में रोजगार के अवसर तैयार करना है।
स्थानीय लोगों को वनोत्पाद के संग्रह और उसे बाजार तक पहुंचाने में सहायता देने की बात भी कही गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संरक्षण के साथ आजीविका के अवसर विकसित करने के लिए केंद्रीय राशि का उपयोग किया जाएगा। हालांकि, इन गतिविधियों के क्रियान्वयन की विस्तृत रूपरेखा अभी सामने नहीं आई है।
केंद्रीय जैव विविधता बोर्ड की टीम दिसंबर में सारंडा पहुंचकर यहां के साल वृक्षों का अध्ययन करेगी। टीम पेड़ों की वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारकों की पहचान और उनकी वैज्ञानिक जांच करेगी। रिपोर्ट में सारंडा को एशिया का सबसे बड़ा साल वन क्षेत्र बताया गया है।
अध्ययन से मिली जानकारी के आधार पर देश के दूसरे हिस्सों में साल के वृक्ष लगाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, जैव विविधता बोर्ड लातेहार में प्रस्तावित टाइगर सफारी के संबंध में राज्य सरकार को सलाह देगा। सारंडा की पहल में अब मंत्रालय के दिशा-निर्देश, विशेषज्ञ व्यवस्था और केंद्रीय टीम के अध्ययन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।