हजारीबाग में बिरहोर परिवारों के पुनर्वास पर एनएचआरसी ने दो सप्ताह में मांगी रिपोर्ट

चट्टी बरियातू कोयला परियोजना से प्रभावित बिरहोर परिवारों के पुनर्वास को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हजारीबाग उपायुक्त से स्थायी समाधान की जानकारी मांगी है।

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हजारीबाग के बिरहोर परिवारों के पुनर्वास मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई

हजारीबाग जिले की चट्टी बरियातू कोयला खनन परियोजना से प्रभावित बिरहोर परिवारों के पुनर्वास का मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष पहुंचा है। आयोग ने उपायुक्त हेमंत सती से दो सप्ताह के भीतर यह बताने को कहा है कि समुदाय के पुनर्वास और स्थानांतरण का कोई स्थायी समाधान निकाला गया है या नहीं। मामले पर आगे विचार के लिए एक नवंबर 2026 तक अतिरिक्त और पूरी रिपोर्ट भी मांगी गई है।

आयोग के सामने दायर शिकायत में खनन के दुष्प्रभाव से दो लोगों की मौत होने और बिरहोर समुदाय के जीवन पर खतरा पैदा होने का आरोप लगाया गया था। शिकायतकर्ता ने पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए थे। इन दावों को शिकायत के आरोपों के रूप में दर्ज किया गया है।

मामले की जांच के लिए गठित संयुक्त समिति के अनुसार, पगार गांव के बिरहोर टोला में कुल 33 घर हैं। समिति ने इनमें से चार घरों को खनन स्थल के पास जर्जर स्थिति में पाया। उसकी रिपोर्ट में धूल के कारण बुखार, खांसी और सांस संबंधी संक्रमण जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का उल्लेख भी किया गया।

संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में ब्लास्टिंग से परिवारों के घरों को नुकसान पहुंचने की बात कही थी। समिति का मत था कि पुनर्वास पूरा होने तक खनन जारी रखना उचित नहीं होगा। आयोग ने आठ अप्रैल 2025 को इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए एनटीपीसी से खनन जारी रखने का कारण और भूमि अधिग्रहण से पहले किए गए सामाजिक प्रभाव आकलन की जानकारी मांगी थी।

एनटीपीसी ने आयोग को बताया कि खनन बिरहोर बस्ती से करीब 350 मीटर दूर हो रहा है और इसके लिए आवश्यक मंजूरियां ली गई हैं। कंपनी ने धूल नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा जाल, पानी का नियमित छिड़काव, पौधरोपण और स्वचालित जल छिड़काव प्रणाली जैसी व्यवस्थाओं का विवरण भी दिया। धेंगा पुनर्वास कॉलोनी में स्थानांतरण का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन अधिकांश परिवार वहां जाने के लिए सहमत नहीं हुए।

जिला प्रशासन की रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार अपने पुश्तैनी जंगल और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े होने के कारण दूसरी जगह बसने को लेकर तैयार नहीं हैं। कुछ परिवारों ने सलगा गांव में बसने की इच्छा जताई, जबकि अन्य ने जंगल के पास जमीन मांगी। प्रशासन ने सरकारी जमीन की तलाश और जरूरत पड़ने पर निजी जमीन लेने की संभावना पर विचार किया है। अब आगे की कार्रवाई उपायुक्त की ओर से आयोग को भेजी जाने वाली रिपोर्ट पर निर्भर करेगी।