एक ही मकान में अलग रहना अकेले तलाक का आधार नहीं: झारखंड हाई कोर्ट

झारखंड हाई कोर्ट ने मानसिक क्रूरता के आधार पर दायर तलाक की अपील खारिज करते हुए कहा कि आरोपों को ठोस, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना जरूरी है।

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रांची स्थित झारखंड हाई कोर्ट का भवन

रांची में झारखंड हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़ी एक अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि पत्नी का उसी मकान में पति से अलग रहना या वैवाहिक संबंधों में दूरी होना मात्र तलाक देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। अदालत ने कहा कि मानसिक क्रूरता के आरोप को ठोस, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना आवश्यक है।

यह अपील रांची फैमिली कोर्ट के 20 मार्च 2023 के फैसले के विरुद्ध दायर की गई थी। फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की समीक्षा करने के बाद निचली अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

पति ने विशेष विवाह अधिनियम की धारा 27(1)(डी) के तहत मानसिक क्रूरता को विवाह विच्छेद का आधार बनाया था। उसका आरोप था कि पत्नी उसके वृद्ध और बीमार माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करती थी, उससे बातचीत नहीं करती थी और एक ही मकान में अलग चूल्हा चलाती थी। उसने वैवाहिक संबंधों से इनकार किए जाने का आरोप भी लगाया था।

पत्नी ने इन आरोपों को नकारते हुए अदालत में कहा कि वह अब भी पति के साथ रहना चाहती है। उसने अपनी ओर से ससुराल की देखभाल करने और पति की पढ़ाई के लिए ऋण लेने का दावा किया। पत्नी ने प्रताड़ना को लेकर बरियातू थाने में मामला दर्ज कराने की जानकारी भी दी थी।

हाई कोर्ट ने पति की ओर से लगाए गए आरोपों को सामान्य और अस्पष्ट पाया। अदालत के अनुसार, रिकॉर्ड में ऐसी कोई विशिष्ट घटना या पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आया जिससे पत्नी के व्यवहार को वैवाहिक जीवन जारी रखना असंभव बनाने वाली गंभीर मानसिक क्रूरता माना जा सके। आरोप प्रमाणित करने की जिम्मेदारी तलाक मांगने वाले पक्ष की थी।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि दांपत्य जीवन के सामान्य मतभेद, छोटी परेशानियां, स्वभावगत असहमति या पति-पत्नी के बीच असंगति अपने आप मानसिक क्रूरता नहीं बन जाती। क्रूरता की गंभीरता ऐसी होनी चाहिए कि परिस्थितियों में दोनों का साथ रहना उचित रूप से संभव न रहे। इसी निष्कर्ष के साथ अपील खारिज कर फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा गया।