गिरिडीह की दुर्गा पूजा में जीवंत है ‘फूलहरा’ परंपरा, मालाकार समाज संवार रहा पारंपरिक शिल्प

करहरबारी के मालाकार कारीगर बांस की खचियों और रंगीन कागज से फूलहरा तैयार कर रहे हैं, जिसे महाअष्टमी पर देवी मंडप में अर्पित किया जाता है।

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गिरिडीह के करहरबारी में दुर्गा पूजा के लिए पारंपरिक फूलहरा तैयार करते मालाकार कारीगर

गिरिडीह की दुर्गा पूजा में इस बार भी पीढ़ियों पुरानी ‘फूलहरा’ परंपरा आस्था और शिल्प के संगम के रूप में दिखाई दे रही है। महाअष्टमी के अवसर पर देवी मंडप में विशेष रूप से अर्पित किए जाने वाले फूलहरा को तैयार करने में करहरबारी इलाके के मालाकार समाज के कारीगर जुटे हैं। स्थानीय पूजा संस्कृति में इसे ‘फूलवारी’ नाम से भी जाना जाता है।

फूलहरा बनाने की तैयारी दुर्गा पूजा शुरू होने से करीब एक सप्ताह पहले आरंभ हो जाती है। कारीगर बांस की खचियों और रंग-बिरंगे कागजों की मदद से इसका ढांचा और सजावट तैयार करते हैं। बारीकी से किए जाने वाले इस काम में मालाकार समाज की पारंपरिक कला दिखाई देती है। हर वर्ष कारीगर इसी शिल्प के माध्यम से पूजा मंडप के श्रृंगार को विशिष्ट रूप देते हैं।

इस परंपरा का महत्व केवल सजावट तक सीमित नहीं है। पपरवाटांड दुर्गा मंडप के पुजारी राम मोहन पांडेय के अनुसार, पुराने समय में आज की तरह बड़ी संख्या में भव्य प्रतिमाएं नहीं बनती थीं। तब मंडप में फूलहरा को ही देवी भगवती का स्वरूप मानकर पूजा-अर्चना की जाती थी। यही ऐतिहासिक जुड़ाव इसे गिरिडीह की दुर्गा पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है।

समय के साथ पूजा के स्वरूप और प्रतिमा निर्माण में बदलाव आया, लेकिन फूलहरा की परंपरा बनी रही। अब यह देवी मंडप की सजावट और धार्मिक अनुष्ठान—दोनों से जुड़ा हुआ है। महाअष्टमी पर इसे अर्पित करने की परंपरा स्थानीय श्रद्धालुओं को अपनी पुरानी मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती है।

फूलहरा मालाकार समाज के उस कौशल का भी उदाहरण है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा है। साधारण बांस और कागज को कलात्मक धार्मिक श्रृंगार में बदलने के लिए धैर्य, अभ्यास और सूक्ष्म कारीगरी की जरूरत होती है। करहरबारी के कारीगर अपनी मेहनत से इस पारंपरिक कला को हर पूजा में नया रूप देते हैं।

आधुनिक सजावट के बढ़ते चलन के बीच गिरिडीह में फूलहरा का निरंतर इस्तेमाल स्थानीय परंपरा की मजबूत उपस्थिति दिखाता है। दुर्गा पूजा के दौरान यह शिल्प न केवल देवी दरबार की भव्यता बढ़ाता है, बल्कि मालाकार समाज की पहचान और क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति को भी जीवंत बनाए रखता है।