हजारीबाग के दुर्गा पूजा पंडाल में शिक्षा की यात्रा और विद्यार्थियों के दबाव को किया गया चित्रित

कालीबाड़ी दुर्गा समिति ने ‘शिक्षा सभी के लिए’ विषय पर पंडाल तैयार किया है। इसमें गुरुकुल से तकनीक आधारित पढ़ाई तक की यात्रा, समावेशी शिक्षा और विद्यार्थियों पर बढ़ते दबाव को दर्शाया गया है।

2 मिनट पढ़ें 3 बार पढ़ी गई
हजारीबाग में शिक्षा विषय पर तैयार कालीबाड़ी दुर्गा पूजा पंडाल

हजारीबाग की कालीबाड़ी दुर्गा समिति ने इस बार दुर्गा पूजा पंडाल को शिक्षा और शिक्षार्थियों पर केंद्रित किया है। ‘शिक्षा सभी के लिए’ विषय के माध्यम से यहां पढ़ाई के बदलते स्वरूप के साथ विद्यार्थियों, शिक्षकों और विद्यालयों पर पड़ने वाले दबाव को अलग-अलग प्रतिरूपों में सामने रखा गया है।

पंडाल में शिक्षा की यात्रा को प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था से आधुनिक, तकनीक आधारित पढ़ाई तक दिखाया गया है। मां को बच्चे की पहली गुरु के रूप में प्रस्तुत करने के साथ ध्यान, योग और गौतम बुद्ध की ध्यान मुद्रा को भी प्रदर्शनी में जगह मिली है। मुख्य प्रवेश द्वार को पुस्तकों के प्रतिरूपों से सजाया गया है।

समिति ने समावेशी शिक्षा के पक्ष को भी रेखांकित किया है। दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए ब्रेल लिपि और श्रवण बाधित बच्चों के लिए सांकेतिक भाषा जैसे माध्यमों को पंडाल की प्रस्तुति में शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य शिक्षा की पहुंच और उसके विभिन्न तरीकों से दर्शकों को परिचित कराना है।

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को मूर्तियों और अन्य सजावटी संरचनाओं के जरिये समझाने का प्रयास किया गया है। इनमें अंक हासिल करने के दबाव से जूझते विद्यार्थी तथा स्कूल प्रबंधन के लक्ष्य पूरे करने के दबाव में काम कर रहे शिक्षक शामिल हैं। चिंता और अवसाद जैसी स्थितियों का चित्रण करते हुए अभिभावकों को बच्चों पर अनावश्यक शैक्षणिक दबाव नहीं डालने का संदेश दिया गया है।

पंडाल और दुर्गा प्रतिमा की तैयारी में पर्यावरण संरक्षण का भी ध्यान रखा गया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार सजावट में कागज, पुस्तकों और अखबार की कतरनों का उपयोग हुआ है, जबकि प्लास्टिक और रसायनों से दूरी रखी गई है। अजंता शैली में बनी प्रतिमा पर रंग का प्रयोग नहीं किया गया है। समिति ने प्रसाद वितरण के लिए सदस्यों हेतु कपड़े की थैलियां भी तैयार की हैं।

निर्माण और सजावट का काम हजारीबाग के कलाकारों ने किया है। इस तरह पूजा आयोजन में स्थानीय कारीगरों को काम मिलने के साथ शिक्षा, मानसिक दबाव और पर्यावरण जैसे विषयों को एक मंच पर रखा गया है। पंडाल धार्मिक आयोजन के बीच पढ़ाई के उद्देश्य और बच्चों के प्रति संवेदनशील व्यवहार पर विचार करने का अवसर देता है।