झारखंड हाईकोर्ट ने गिरिडीह डाकघर से जुड़े कथित वित्तीय घोटाले के एक मामले में केंद्र सरकार की रिट याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक कर्मचारी का शुरुआती तीन महीने के बाद जारी निलंबन अवैध माना गया था। कर्मचारी को इस अवधि का वेतन पहले मिल चुके निर्वाह भत्ते का समायोजन कर देने का निर्देश भी कायम रहेगा।
मामला गिरिडीह डिवीजन में सामने आए 26 करोड़ रुपये से अधिक के कथित डाकघर घोटाले से संबंधित है। कर्मचारी शशि भूषण कुमार को 27 सितंबर 2019 को निलंबित किया गया था। विभाग ने उन पर गिरिडीह प्रधान डाकघर में ट्रेजरर और बाद में एपीएम (एसबी) के पद पर रहते हुए वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में प्रमुख आरोपी होने का आरोप लगाया था। मामले की जांच सीबीआई ने की और बाद में दो मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए गए।
कर्मचारी ने विभागीय अपील के बाद कैट का रुख किया था। अधिकरण ने जुलाई 2025 में दिए फैसले में पाया कि निलंबन के तीन महीने के भीतर विभागीय आरोपपत्र जारी नहीं किया गया। इसी आधार पर तीन महीने के बाद बढ़ाए गए निलंबन को रद्द करते हुए संबंधित अवधि का वेतन देने का आदेश दिया गया था।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने दर्ज किया कि कर्मचारी को सितंबर 2019 में निलंबित किया गया, जबकि विभागीय आरोपपत्र 7 मार्च 2022 को दिया गया। अदालत के अनुसार, आरोपपत्र के बिना लगभग ढाई वर्ष तक निलंबन जारी रखना कानून के अनुरूप नहीं था। विभागीय कार्रवाई 2026 में पूरी हुई और पूरी प्रक्रिया करीब सात वर्ष चली।
हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के अजय कुमार चौधरी बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि 90 दिनों के भीतर आरोपपत्र नहीं दिए जाने पर निलंबन को अनिश्चित समय तक जारी नहीं रखा जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक जांच लंबित होने को अनिश्चितकालीन निलंबन का आधार नहीं बनाया जा सकता।
केंद्र सरकार ने मामले की गंभीरता और सीबीआई जांच का हवाला देकर निलंबन को उचित बताया था। हाईकोर्ट ने हालांकि कैट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई और याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी भविष्य में दंडादेश को चुनौती देता है तो उस विषय पर अलग से सुनवाई होगी। मौजूदा आदेश निलंबन की अवधि और उससे जुड़े वेतन तक सीमित है।