गुवा गोलीकांड की 46वीं बरसी: पश्चिमी सिंहभूम ने याद की 10 आदिवासियों की शहादत

पश्चिमी सिंहभूम के गुवा में 8 सितंबर 1980 को अधिकारों की मांग के दौरान मारे गए आदिवासियों की स्मृति आज भी झारखंड के इतिहास और आंदोलन से जुड़ी है।

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पश्चिमी सिंहभूम के गुवा गोलीकांड की 46वीं बरसी से संबंधित प्रतीकात्मक दृश्य

पश्चिमी सिंहभूम के खनन क्षेत्र गुवा में 8 सितंबर 1980 को हुए गोलीकांड की मंगलवार को 46वीं बरसी रही। जल, जंगल, जमीन, रोजगार और स्थानीय अधिकारों से जुड़ी मांगों के बीच हुई इस घटना में मारे गए 10 आदिवासियों की स्मृति आज भी क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उस दौर में कोल्हान क्षेत्र में वन विभाग की कार्रवाई और इस्को की स्थानीय खदानों में रोजगार तथा अधिकारों के सवाल को लेकर असंतोष था। इन्हीं मुद्दों पर गुवा में एक बड़ी जनसभा बुलाई गई थी। प्रशासन ने इलाके में धारा 144 लागू कर दी थी और आवागमन के साधनों पर रोक लगाई गई थी, फिर भी बड़ी संख्या में ग्रामीण पैदल चलकर सभा स्थल पहुंचे थे।

प्रदर्शनकारी जंगल कटाई से जुड़े मामलों में जेल भेजे गए लोगों की रिहाई, खदानों से निकलने वाले लाल पानी को नदी-नालों और खेतों में छोड़े जाने पर रोक तथा स्थानीय निवासियों के अधिकारों की मांग कर रहे थे। इसी दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, गुवा बाजार की झड़प में बिहार मिलिट्री पुलिस के चार जवान और दो आदिवासी आंदोलनकारी मारे गए थे।

घटना का सबसे गंभीर हिस्सा अस्पताल परिसर से जुड़ा बताया जाता है। मीडिया रिपोर्ट में आरोप है कि इलाज के लिए पहुंचे घायल आदिवासियों के तीर-धनुष बाहर रखवा दिए गए और बाद में आठ निहत्थे आदिवासियों को गोली मार दी गई। वर्ष 1981 की एक नागरिक अधिकार तथ्य-जांच रिपोर्ट में भी अस्पताल परिसर में आठ आदिवासियों के मारे जाने का उल्लेख किया गया था।

गोलीकांड की गूंज तत्कालीन बिहार से लेकर संसद तक पहुंची थी। घटना के बाद आदिवासियों के पारंपरिक तीर-धनुष रखने पर प्रतिबंध का फैसला सामने आया, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हस्तक्षेप के बाद वापस लिया गया। सरकारी जांच की पूरी रिपोर्ट और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से सहज उपलब्ध नहीं होने के बावजूद गुवा की घटना झारखंड आंदोलन, स्थानीय अधिकारों और आदिवासी अस्मिता की स्मृति से जुड़ी हुई है।