पूर्वी सिंहभूम जिले के घाटशिला प्रखंड स्थित काड़ाडूबा गांव में पारंपरिक कुम्हारी का दायरा लगातार सिमट रहा है। गांव में करीब 300 कुंभकार परिवार होने के बावजूद अब केवल 15 से 20 परिवार ही मिट्टी के बर्तन बनाने का काम जारी रखे हुए हैं। आधुनिक बर्तनों का बढ़ता इस्तेमाल, उपयुक्त मिट्टी की कमी और जलावन जुटाने में परेशानी इस पेशे के सामने प्रमुख चुनौतियां बताई गई हैं।
कारीगरों के अनुसार मिट्टी के बर्तनों की मांग पूरे साल एक जैसी नहीं रहती। बिक्री मुख्य रूप से त्योहारों के आसपास बढ़ती है, जबकि बाकी समय नियमित आमदनी का साधन नहीं बन पाती। परिवार का खर्च चलाने में कठिनाई होने के कारण नई पीढ़ी भी इस पुश्तैनी काम से दूर हो रही है।
गांव के विजय पाल, कृष्ण चंद्र पाल और जगन्नाथ पाल ने उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए भट्ठे का शेड और इलेक्ट्रॉनिक चाक उपलब्ध कराने की जरूरत बताई है। उनका मानना है कि आधुनिक उपकरण मिलने पर कम समय में अधिक बर्तन तैयार किए जा सकेंगे और परंपरागत व्यवसाय को बनाए रखने में सहायता मिलेगी।
काड़ाडूबा के कई परिवारों के सामने आवास की समस्या भी बनी हुई है। भारती पाल, निर्मला पाल और मिथिला पाल समेत स्थानीय महिलाओं ने बताया कि पक्के मकान के लिए वे करीब 15 वर्षों से आवेदन कर रही हैं, लेकिन अब तक लाभ नहीं मिला। गांव के कई परिवार कच्चे घरों में रह रहे हैं और पेयजल के लिए एक ही कुएं पर निर्भर हैं।
ग्राम प्रधान कालीपदो पाल ने सरकारी सहयोग और आवश्यक संसाधनों की कमी को कुम्हारी के कमजोर होने की बड़ी वजह बताया। उनके अनुसार समय पर सुविधाएं और आर्थिक सहायता मिलने से गांव की पारंपरिक कला को बचाने तथा परिवारों को फिर इस काम से जोड़ने की संभावना बन सकती है।
मुखिया माही हांसदा के मुताबिक आवास योजना के लिए ग्रामसभा के माध्यम से लाभार्थियों का चयन करके जियो टैगिंग कराई गई है और प्रस्ताव प्रखंड कार्यालय भेजा जा चुका है। हालांकि राशि उपलब्ध नहीं होने के कारण निर्माण शुरू नहीं हुआ है। गांव के कारीगर अब आवास सहायता के साथ उत्पादन के आधुनिक साधनों और बुनियादी सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं।