चतरा के डीएमएफटी प्रशिक्षण हॉल में रविवार को जिला ग्राम सभा मंच का एक दिवसीय वार्षिक सम्मेलन आयोजित हुआ। बैठक में वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन, वनपट्टा वितरण और विकास परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन से जुड़े विषय प्रमुखता से उठाए गए। प्रतिभागियों ने 23 अक्टूबर को रांची के मोरहाबादी मैदान में प्रस्तावित कार्यक्रम में शामिल होने का निर्णय भी लिया।
सम्मेलन में वन अधिकार अधिनियम 2006, उसके 2008 के नियमों और 2012 में संशोधित प्रावधानों को लागू करने पर चर्चा की गई। एफआरए सेल के सदस्य अखोरी प्रभास ने आरोप लगाया कि जिला और अनुमंडल स्तरीय वनाधिकार समितियों की प्रक्रिया में अन्य परंपरागत वन निवासियों को व्यक्तिगत वनपट्टा नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने इसे कानून के अनुरूप सुधारने की मांग रखी।
मंच के जिला प्रभारी अशोक भारती ने वन विभाग की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए। उनका आरोप था कि वर्षों से खेती कर रहे आदिवासी और अन्य परंपरागत निवासियों की जमीन पर पौधारोपण के नाम पर ट्रेंच, पीट और गड्ढे खोदे गए तथा उन्हें मुकदमे की चेतावनी दी गई। ये बातें सम्मेलन में पक्षकारों के दावे के रूप में सामने आईं।
प्रतिनिधियों ने गैर-मजरूआ जमीन की रसीद फिर से जारी करने की मांग की। सम्मेलन में कहा गया कि ऐसी जमीन की रसीद 2014 तक काटी जाती थी। भारतमाता परियोजना से प्रभावित लोगों के लिए पुनर्वास नीति के तहत उचित मुआवजा और दूसरे निर्धारित लाभ सुनिश्चित करने का मुद्दा भी रखा गया।
बैठक में शामिल लोगों ने कहा कि वनवासियों से जुड़े प्रश्नों का समाधान नहीं होने पर आंदोलन का रास्ता अपनाया जा सकता है। साथ ही तय किया गया कि रांची के कार्यक्रम में पहुंचकर इन समस्याओं से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अवगत कराया जाएगा। सम्मेलन में विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि, अधिवक्ता और ग्रामीण शामिल हुए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मंच की जिलाध्यक्ष अंजु देवी ने की, जबकि संचालन सिकंदर खरवार ने किया। सम्मेलन में अखोरी प्रभास के अलावा राजेश महतो, सोहनलाल कुम्हार, कुंदन गुप्ता, प्रकाश भारती तथा अधिवक्ता अर्जुन महतो, विरेंद्र तिवारी और निर्मल दांगी समेत अन्य लोग उपस्थित रहे।