रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने चार साल की बच्ची की कस्टडी से जुड़े मामले में हजारीबाग फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश दिया है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि कस्टडी और अभिभावकता के विवाद में बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण आधार है। यह व्यवस्था मुख्य कस्टडी मामले का अंतिम निर्णय आने तक लागू रहेगी।
अदालत ने बच्ची की कम उम्र पर विशेष ध्यान दिया। उपलब्ध विवरण के अनुसार बच्ची की आयु करीब चार वर्ष छह महीने है। पीठ का मत था कि इस अवस्था में उसे मां के प्यार और स्नेह की विशेष आवश्यकता है तथा वह अपनी पसंद के बारे में समझदारी से स्वतंत्र निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है। अदालत ने बच्ची के आईवीएफ से जन्म और इस प्रक्रिया में मां की पीड़ा व त्याग को भी परिस्थितियों के आकलन में शामिल किया।
हाईकोर्ट ने पिता के मुलाकात के अधिकार को भी सुरक्षित रखा है। आदेश के मुताबिक पिता प्रत्येक सप्ताहांत सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बच्ची से मिल सकेंगे। इसके लिए आवश्यक व्यवस्था करने के साथ यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि मुलाकात के कारण बच्ची की पढ़ाई प्रभावित न हो।
दंपती का विवाह 16 मई 2017 को हुआ था और आपसी सहमति से आईवीएफ प्रक्रिया अपनाने के बाद 8 मार्च 2022 को बेटी का जन्म हुआ। दोनों हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वैवाहिक विवाद के दौरान मां ने प्रताड़ना और बच्ची से मिलने से रोके जाने के आरोप लगाए थे, जबकि पिता ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि मां अपनी इच्छा से घर छोड़कर गई थी। ये परस्पर दावे अभी विवादित पक्ष हैं।
मां ने Guardians and Wards Act, 1890 की धारा 12 के तहत अंतरिम कस्टडी मांगी थी। हजारीबाग फैमिली कोर्ट ने 27 नवंबर 2025 को यह मांग खारिज कर दी थी, हालांकि उसे बच्ची से मिलने का अधिकार दिया गया था। इसी आदेश को मां ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
सुनवाई में हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि माता या पिता में से किसका कानूनी अधिकार अधिक है। पीठ ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 13 और Guardians and Wards Act की धारा 12 सहित संबंधित कानूनी प्रावधानों का उल्लेख करते हुए बच्चे के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता माना। अंतिम अभिभावकता का प्रश्न मूल मामले के निर्णय में तय होगा।