धनबाद जिले के चिरकुंडा नगर परिषद क्षेत्र में स्थित लायकपाड़ा की दुर्गा पूजा दो सौ साल से अधिक पुरानी बताई जाती है। पश्चिम बंगाल की सीमा के पास नेहरू रोड स्थित मंदिर में होने वाली यह पूजा कोयलांचल की प्राचीन दुर्गा पूजाओं में गिनी जाती है। यहां प्रतिमा को जंजीर से बांधकर रखने की परंपरा श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।
स्थानीय लोगों की मान्यता है कि अष्टमी और नवमी के दिन प्रतिमा में हल्का कंपन होता है। इसी मान्यता के आधार पर सुरक्षा के लिए प्रतिमा को जंजीर से बांधा जाता है। अष्टमी की पूजा से जुड़ा एक अन्य नियम भी है—उस दिन ढोल-नगाड़े नहीं बजाए जाते। पूजा की शुरुआत खड़की पूजा से होती है और नवमी के प्रवेश पर पात्र की बलि देने की परंपरा निभाई जाती है।
पूजा की शुरुआत को लेकर क्षेत्र में एक किंवदंती प्रचलित है। इसके अनुसार, दक्षिण राय लायक को स्वप्न में देवी की स्थापना कर पूजा आरंभ करने का संदेश मिला था। इसके बाद उन्होंने रामकुमार लायक और केशोराम लायक के साथ विचार-विमर्श किया तथा बस्ती के लोगों को इसकी जानकारी दी।
बताया जाता है कि आरंभ में लोगों ने चारों ओर बांस लगाकर चौताल तैयार किया और वहीं प्रतिमा स्थापित कर पूजा शुरू की। समय के साथ उस स्थान पर मंदिर का निर्माण हुआ। मौजूदा मंदिर को करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। वर्तमान में कमल चक्रवर्ती यहां पुजारी हैं और उनके पूर्वज भी मंदिर में पूजा कराते रहे हैं।
मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के कारण धनबाद और कतरास के अलावा दूर के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, सिलीगुड़ी तक से श्रद्धालु पूजा देखने आते हैं। मनोकामना पूरी होने की आस्था के साथ कुछ श्रद्धालु यहां पात्र की बलि भी देते हैं।
पूजा के आयोजन के लिए स्थानीय समिति बनाई गई है। प्रशांत लायक समिति के अध्यक्ष, कन्हाई लायक सचिव और अभिजित दास कोषाध्यक्ष हैं। इनके साथ कार्यकारिणी के सदस्य अनुष्ठानों और आयोजन की व्यवस्था संभाल रहे हैं। पुरानी धार्मिक परंपराओं और स्थानीय सहभागिता के कारण लायकपाड़ा की यह पूजा क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है।