रांची के चुटिया स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर में शारदीय नवरात्र के दौरान दुर्गा आराधना के साथ रामायण पाठ की परंपरा निभाई जा रही है। नौ दिनों तक चलने वाले रामायण नवाह्न परायण महायज्ञ में कुंवारी कन्याएं एक साथ बैठकर चौपाइयों का सस्वर पाठ करती हैं। इस आयोजन में रामकथा के माध्यम से श्रीराम के आदर्शों, मर्यादा और जीवन मूल्यों को याद किया जाता है।
मंदिर में यह परंपरा वर्ष 1970 से चली आ रही बताई गई है। पांच दशक से अधिक समय में सामूहिक पाठ यहां के नवरात्र आयोजन की प्रमुख पहचान बन गया है। इसमें नई पीढ़ी की भागीदारी को विशेष महत्व दिया जाता है। आयोजन से जुड़े विवरण के अनुसार, इसका उद्देश्य कन्याओं को धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के साथ शिक्षा और संस्कारों को प्रोत्साहित करना भी है।
पत्थरों से बना दो मंजिला मंदिर अपनी प्राचीन स्थापत्य शैली के कारण रांची के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग दिखाई देता है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण मंदिर के निर्माण को नागवंशी राजा रघुनाथ शाहदेव के समय, लगभग 1685 से 1687 ईस्वी के बीच का बताते हैं। हालांकि, इसके निर्माणकाल के संबंध में अलग-अलग विवरण भी मिलते हैं।
स्थानीय मान्यताओं में चुटिया को कभी नागवंशी राजाओं की राजधानी बताया जाता है। मंदिर को मूल रूप से राधाबल्लभ मंदिर के नाम से भी जाना जाता था। वर्तमान में यहां श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इस कारण परिसर में रामभक्ति और कृष्णभक्ति की परंपराएं साथ दिखाई देती हैं।
मंदिर की सांस्कृतिक पहचान केवल नवरात्र के रामायण पाठ तक सीमित नहीं है। यहां होली के अवसर पर फगडोल जतरा निकालने की परंपरा भी रही है, जिसमें विग्रहों को सुसज्जित डोले में रखकर धार्मिक यात्रा निकाली जाती है। स्थानीय परंपरा इसका संबंध भी नागवंशी काल से जोड़ती है।
मंदिर से संत चैतन्य महाप्रभु के आगमन की मान्यता भी जुड़ी है। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी की यात्रा के दौरान वह इस क्षेत्र में ठहरे थे, हालांकि इस प्रसंग के भी अलग-अलग ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध हैं। नवरात्र में कन्याओं द्वारा किया जाने वाला रामायण पाठ फिलहाल इस प्राचीन परिसर की जीवित धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।