लातेहार जिले के ग्रामीण इलाकों में छठ महापर्व ने बांस के सूप और दउरा बनाने वाले आदिम जनजाति समुदाय के कारीगरों के लिए आमदनी का महत्वपूर्ण अवसर पैदा किया है। पर्व के दौरान इन पारंपरिक उत्पादों की मांग बढ़ने से समुदाय के कई परिवार निर्माण और बिक्री के काम में जुट गए हैं।
स्थानीय कारीगरों के अनुसार, सामान्य दिनों में सूप-दउरा की बिक्री सीमित रहती है। छठ के समय व्यापारी गांवों से इनकी थोक खरीद करते हैं। आम दिनों में 100 से 120 रुपये के बीच बिकने वाला सूप पर्व के दौरान 200 से 250 रुपये तक में बिक जाता है। इस तरह कीमत लगभग दो से ढाई गुना बढ़ जाती है।
कारीगर कैलाश परहिया ने बताया कि छठ आने पर सूप और दउरा की बिक्री तेज हो जाती है। लखन परहिया के मुताबिक, एक व्यक्ति दिनभर में दो से तीन सूप तैयार कर सकता है और पर्व के समय खरीदार भी आसानी से मिल जाते हैं। समुदाय के लिए यह अवधि पूरे महीने घरेलू खर्च जुटाने का माध्यम बनती है।
सूप तैयार करने की प्रक्रिया में काफी श्रम लगता है। ग्रामीण दोंबल परहिया के अनुसार, पहले जंगल से बांस लाया जाता है। उसे दो दिनों तक पानी में भिगोने के बाद पतली पट्टियों में काटा जाता है और फिर हाथ से बुनकर सूप बनाया जाता है। कारीगरों का कहना है कि सामान्य दिनों की कम कीमत के कारण वे इस काम को नियमित रूप से नहीं कर पाते।
दुखराज परहिया के अनुसार, कई कारीगर छठ के दौरान सूप-दउरा बनाने के लिए गांव में रुकते हैं। पर्व समाप्त होने के बाद उनमें से अधिकांश मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। इससे पता चलता है कि बढ़ी हुई मांग अभी एक सीमित अवधि का रोजगार उपलब्ध कराती है।
जिला परिषद सदस्य विनोद उरांव ने इस पारंपरिक व्यवसाय को कुटीर उद्योग के रूप में बढ़ावा देने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि सरकारी और प्रशासनिक सहयोग मिलने पर आदिम जनजाति समुदाय को अपने श्रम का बेहतर मूल्य मिल सकता है। फिलहाल छठ का बाजार इन कारीगरों के कौशल और स्थानीय आजीविका के बीच एक अहम कड़ी बना हुआ है।