जघन्य अपराध में लंबी कैद ही जमानत का आधार नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

पूर्वी सिंहभूम के 2015 के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषी की याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने लंबी न्यायिक हिरासत को पर्याप्त आधार नहीं माना।

2 मिनट पढ़ें 3 बार पढ़ी गई
झारखंड24 का पूर्ण लोगो—प्रकाशक की लोगो-मात्र छवि के स्थान पर

झारखंड हाईकोर्ट ने पूर्वी सिंहभूम के मुसाबनी थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे धानों टुडू की सजा स्थगित करने और जमानत पर रिहा करने की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि किसी जघन्य अपराध में केवल 10 वर्ष या उससे अधिक समय जेल में बिताना जमानत अथवा सजा स्थगन का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया। मामला 19 नवंबर 2015 को मुसाबनी थाना क्षेत्र के तिलाबनी गांव में करमा पूजा के दौरान एक नाबालिग बच्ची को साथ ले जाने और बाद में उसकी हत्या किए जाने से संबंधित है।

प्रकाशित विवरण के अनुसार, घटना के अगले दिन बच्ची का शव गांव की झाड़ियों में मिला था। मामले में छोटका गोप और धानों टुडू के विरुद्ध मुकदमा चला। जमशेदपुर की विशेष पॉक्सो अदालत ने 25 फरवरी 2020 को दोनों को दोषी करार दिया था।

विशेष अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके अतिरिक्त धारा 376डी/511 के तहत दुष्कर्म के प्रयास के मामले में 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा भी दी गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वह करीब साढ़े दस वर्ष जेल में रह चुका है और आजीवन कारावास की सजा का बड़ा हिस्सा काट चुका है। इसी आधार पर न्यायहित में उसकी सजा स्थगित कर जमानत देने का अनुरोध अदालत से किया गया था।

राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए अदालत को बताया कि हाईकोर्ट दो नवंबर 2023 को गुण-दोष के आधार पर भी आवेदक की सजा स्थगित करने की मांग खारिज कर चुका है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने लंबी कारावास अवधि को अपने-आप में पर्याप्त आधार मानने से इनकार कर दिया।