जीएसटी काउंसिल की बैठक में झारखंड ने कोयले को जीएसटी के दायरे से बाहर कर उस पर पांच प्रतिशत वैट लगाने की अनुमति मांगी है। राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने बैठक में कहा कि मौजूदा डेस्टिनेशन आधारित व्यवस्था से कोयला उत्पादक राज्यों को अपेक्षित राजस्व नहीं मिल रहा है।
वित्त मंत्री के अनुसार, देश के कुल कोयला भंडार का करीब 23.27 प्रतिशत झारखंड में है। उन्होंने कहा कि खनन गतिविधियों के कारण राज्य को विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। प्रस्तावित व्यवस्था से अंतरराज्यीय बिक्री पर उत्पादक राज्यों को दो प्रतिशत केंद्रीय बिक्री कर लगाने का अवसर मिलने की बात भी रखी गई।
बैठक में झारखंड के 1.36 लाख करोड़ रुपये के पुराने बकाये के समाधान का मुद्दा भी उठाया गया। वित्त मंत्री ने विभिन्न केंद्रीय नीतियों और कानूनों में बदलाव से राज्य पर करीब 22 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ने का दावा किया। इसमें जीएसटी दरों के युक्तीकरण, एक केंद्रीय योजना के फंडिंग पैटर्न और एमएमडीआर कानून में संशोधनों से जुड़े अनुमान शामिल हैं।
राज्य की ओर से यह दावा भी किया गया कि जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर समाप्त होने पर झारखंड को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है। इन वित्तीय प्रभावों को देखते हुए खनिज उत्पादक राज्यों के लिए अलग सहायता व्यवस्था तैयार करने की जरूरत बताई गई।
झारखंड ने इसके लिए ‘रिसोर्स ओरिजिन एंड इकोलॉजिकल इक्वलाइजेशन फ्रेमवर्क’ बनाने का प्रस्ताव रखा। सुझाए गए ढांचे में खनिजों की मात्रा और मूल्य, उपयोग की गई वन एवं भूमि, प्रदूषण, पर्यावरण बहाली की लागत, विस्थापन तथा प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों के मुआवजे जैसे आधार शामिल करने की मांग की गई। खदान बंद होने के बाद न्यायसंगत बदलाव की जरूरतों को भी इसमें स्थान देने का सुझाव दिया गया।
वित्त मंत्री ने जीएसटी व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए राज्यवार और स्रोत-गंतव्य आधारित इनपुट टैक्स क्रेडिट निपटान का विवरण जारी करने की मांग भी की। बैठक में वाणिज्य कर विभाग के सचिव अमीत कुमार भी मौजूद थे। झारखंड का पक्ष था कि राष्ट्रीय विकास से जुड़ी लागत और उसके लाभ का वितरण निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए।