सीएमपीएफओ के डीएचएफएल निवेश मामले की सीबीआई जांच का झारखंड हाईकोर्ट ने दिया आदेश

झारखंड हाईकोर्ट ने सीएमपीएफओ की डीएचएफएल में फंसी 727.67 करोड़ रुपये की राशि से जुड़े मामले की जांच सीबीआई से कराने का निर्देश दिया है।

2 मिनट पढ़ें 7 बार पढ़ी गई
रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट का भवन, जहां सीएमपीएफओ निवेश मामले पर सुनवाई हुई

रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (सीएमपीएफओ) की डीएचएफएल में फंसी 727.67 करोड़ रुपये की राशि से जुड़े मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से कराने का आदेश दिया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने गुरुवार को संबंधित जनहित याचिका पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह निर्देश दिया।

यह जनहित याचिका कोल इंप्लाइज वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दायर की गई थी। याचिका में सीएमपीएफओ द्वारा कर्मचारियों की भविष्य निधि से जुड़ी राशि के निवेश और उसका बड़ा हिस्सा वापस नहीं मिलने पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका के अनुसार, संगठन ने डीएचएफएल में करीब 1,300 करोड़ रुपये निवेश किए थे। कंपनी के दिवालिया होने के बाद इसमें से 727.67 करोड़ रुपये की वसूली नहीं हो सकी।

अदालत के समक्ष रखी गई जानकारी के मुताबिक, फंसी हुई निवेश राशि वापस लेने के लिए 20 दिसंबर 2019 को हुई सीएमपीएफओ की बैठक में आवश्यक कदम उठाने का प्रस्ताव पारित किया गया था। इसके बाद भी पूरी रकम की वापसी नहीं हुई। याचिकाकर्ताओं ने निवेश के निर्णय और वसूली के लिए अपनाई गई प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग की थी।

मामले में 22 नवंबर 2021 को ट्रस्टी के अधीन इन्वेस्टमेंट सब-कमेटी की बैठक का भी उल्लेख किया गया। बताया गया कि उस बैठक में 727.67 करोड़ रुपये को राइट ऑफ करने का प्रस्ताव रखा गया था। कर्मचारियों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि भविष्य निधि से जुड़ी इतनी बड़ी राशि के संबंध में जवाबदेही तय होना जरूरी है।

सुनवाई में कोल इंडिया के निदेशक मंडल की ओर से रखे गए उस प्रस्ताव की जानकारी भी दी गई, जिसमें नुकसान की भरपाई के लिए कोयला उत्पादन पर 10 रुपये प्रति टन सेस लगाने की बात थी। कर्मचारियों ने इस व्यवस्था पर भी प्रश्न उठाए। खंडपीठ ने निवेश, वसूली के प्रयासों, राइट ऑफ प्रस्ताव और कर्मचारियों की आपत्तियों से जुड़े पक्षों को सुना।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब सीबीआई मामले से संबंधित पूरे घटनाक्रम की जांच करेगी। जांच के दायरे में निवेश का निर्णय, डीएचएफएल में राशि लगाने की प्रक्रिया, रकम वापस पाने के लिए किए गए प्रयास और राइट ऑफ प्रस्ताव से जुड़े पहलू आ सकते हैं। सीबीआई जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति या संस्था की जिम्मेदारी के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।