रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में पति की तलाक संबंधी अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि पत्नी की ओर से पति के मायके में घरजमाई के रूप में रहने की इच्छा व्यक्त करना मात्र वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
मामले की सुनवाई जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत में हुई। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मानसिक क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक मांगा था। फैमिली कोर्ट ने जुलाई 2022 में उसकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि समाज में घरजमाई की प्रथा पुरानी है, लेकिन इस रूप में रहना संबंधित व्यक्ति की अपनी पसंद पर निर्भर करता है। अदालत के अनुसार, इस मामले में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो कि पति को जबरन घरजमाई बनने के लिए बाध्य किया गया था।
अदालत ने पत्नी के मायके जाने से जुड़े तर्क पर भी विचार किया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी का अपने मायके जाना उसका अधिकार है। केवल इस आधार पर उसके व्यवहार को क्रूरता मानकर विवाह समाप्त करने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने वैवाहिक क्रूरता के आकलन को लेकर कहा कि हर विवाद के तथ्यों और परिस्थितियों को अलग-अलग देखना जरूरी है। पति-पत्नी के बीच सामान्य मतभेद, छोटी असहमति या संबंधों में आने वाली सामान्य खटास अपने आप मानसिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं आती।
अदालत के मुताबिक, तलाक के आधार के रूप में क्रूरता की गंभीरता ऐसी होनी चाहिए जिससे दंपती के लिए साथ रहना असहनीय हो जाए। उपलब्ध तथ्यों में जबरन घरजमाई बनाने जैसी परिस्थिति नहीं मिलने पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए पति की अपील अस्वीकार कर दी।