झारखंड हाईकोर्ट ने स्नातक प्रशिक्षित शिक्षक संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा-2016 से चयनित 34 शिक्षकों के पक्ष में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ ने राज्य सरकार से इन शिक्षकों की नियुक्ति तिथि फरवरी 2019 से मानते हुए वरिष्ठता और अन्य संबंधित सेवा लाभ देने को कहा है। आदेश के अनुपालन के लिए सरकार को 12 सप्ताह का समय दिया गया है।
अदालत के निर्देश के अनुसार शिक्षकों को फरवरी 2019 की नोशनल तिथि के आधार पर वरिष्ठता, वेतन निर्धारण, उच्चतर वेतनमान और वार्षिक वेतन वृद्धि जैसे परिणामी लाभ मिलेंगे। हालांकि, उन्हें फरवरी 2019 से वास्तविक नियुक्ति होने तक की अवधि का बकाया वेतन नहीं दिया जाएगा।
यह मामला झारखंड कर्मचारी चयन आयोग के विज्ञापन संख्या 21/2016 के तहत हुई भर्ती से जुड़ा है। याचिकाकर्ता इतिहास, नागरिक शास्त्र, भूगोल, अर्थशास्त्र, वाणिज्य, शारीरिक शिक्षा, कुड़ुख, संस्कृत, नागपुरी, अंग्रेजी, हिंदी तथा विज्ञान और गणित से जुड़े विभिन्न विषयों के अभ्यर्थी थे। इसी चयन प्रक्रिया के कई अन्य सफल अभ्यर्थियों को फरवरी 2019 में लातेहार जिले में पदस्थापित कर दिया गया था।
इन 34 शिक्षकों की नियुक्ति बाद में हुई थी। भर्ती में विलंब की पृष्ठभूमि राज्य के 13 अनुसूचित जिलों में लागू शत-प्रतिशत स्थानीय निवासी आरक्षण व्यवस्था से जुड़ी थी। वर्ष 2020 में हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने इस नीति को निरस्त कर दिया था, जिसके बाद विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।
शीर्ष अदालत ने नया विज्ञापन निकालने के स्थान पर पुरानी भर्ती की संशोधित राज्यस्तरीय मेधा सूची तैयार करने का निर्देश दिया था। आयोग द्वारा संशोधित सूची जारी किए जाने के बाद याचिकाकर्ताओं को वर्ष 2023 में नियुक्ति मिली। देर से नियुक्ति के कारण उनकी सेवा अवधि और वरिष्ठता प्रभावित हो रही थी।
हाईकोर्ट ने पूर्व के अजय कुमार मामले के निर्णय को आधार बनाते हुए कहा कि प्रशासनिक और कानूनी अड़चनों से हुई देरी के लिए अभ्यर्थियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पीठ के अनुसार, समान चयन प्रक्रिया का हिस्सा होने के बावजूद केवल नियुक्ति पत्र देर से मिलने के कारण उन्हें संबंधित अधिकारों से वंचित करना न्यायसंगत नहीं होगा।