हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड स्थित दूधमटिया जंगल से शुरू हुई वृक्ष संरक्षण की मुहिम अब दो हजार से अधिक गांवों तक पहुंच गई है। यहां हर वर्ष 7 अक्टूबर को आयोजित वन महोत्सव में ग्रामीण पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधते हैं और उनकी सुरक्षा का संकल्प लेते हैं। आयोजन में वन संरक्षण को स्थानीय आस्था और सामुदायिक भागीदारी से जोड़ा गया है।
दूधमटिया में इस परंपरा की शुरुआत 1999 में शिक्षक महादेव महतो ने अपने कुछ साथियों के साथ की थी। इसका उद्देश्य पेड़ों की अंधाधुंध कटाई रोकना और ग्रामीणों को जंगल के महत्व के प्रति जागरूक करना था। अभियान के शुरुआती दौर में गीतों के माध्यम से लोगों तक वन संरक्षण का संदेश पहुंचाया गया।
महोत्सव के दिन सबसे पहले वन देवी की पूजा की जाती है। इसके बाद ग्रामीण और दूर-दराज से आए पर्यावरण प्रेमी पेड़ों पर लाल कपड़ा बांधकर उनकी रक्षा की शपथ लेते हैं। आयोजन के दौरान प्रकृति तथा पेड़-पौधों की सुरक्षा से जुड़े कार्यक्रम भी होते हैं। वन विभाग की ओर से लगाए जाने वाले स्टॉलों के माध्यम से लोगों को पर्यावरण संरक्षण की जानकारी दी जाती है।
कार्यक्रम में पहुंचे प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार के अनुसार, यह पहल दो हजार से अधिक गांवों तक फैल चुकी है। उन्होंने इसे जंगलों की सुरक्षा के प्रति लोगों की बढ़ती समझ से जोड़ा। आयोजन से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, दूधमटिया से शुरू हुआ वृक्ष रक्षाबंधन कार्यक्रम झारखंड के बाहर भी कई राज्यों तक पहुंचा है।
दूधमटिया का मॉडल वन संरक्षण में ग्रामीण समुदाय की सीधी भूमिका को सामने रखता है। यहां पूजा, सामूहिक संकल्प और जागरूकता कार्यक्रम एक ही मंच पर आयोजित होते हैं। स्थानीय पहल के रूप में शुरू हुआ वन महोत्सव अब दूसरे क्षेत्रों के आयोजनों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत माना जा रहा है।