देवघर में दुर्गा पूजा सहित विभिन्न पर्वों के लिए मिट्टी की प्रतिमाएं बनाने वाले कारीगर इन दिनों बढ़ती लागत और घटती आमदनी की चुनौती का सामना कर रहे हैं। शहर और आसपास के क्षेत्रों में कलाकार प्रतिमा निर्माण में जुटे हैं, लेकिन उनका कहना है कि जरूरी सामग्री महंगी होने और उपयुक्त मिट्टी मिलने में कठिनाई के कारण इस पारंपरिक काम से परिवार चलाना मुश्किल होता जा रहा है।
मूर्तिकार ब्रजेश वर्मा के अनुसार, पहले एक प्रतिमा से 40 से 50 हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती थी, जबकि अब 15 से 20 हजार रुपये कमाना भी कठिन है। कारीगरों का कहना है कि चिकनी मिट्टी, पुआल, भूसा और दूसरी सामग्रियों की कीमत बढ़ने से निर्माण खर्च लगातार ऊपर गया है। इसके अनुपात में मिलने वाली राशि नहीं बढ़ने से उनकी आय प्रभावित हुई है।
परिवार की पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहे कुंदन पंडित ने बताया कि आमदनी संतोषजनक नहीं होने के बावजूद वह इस कला से जुड़े हुए हैं। उनके मुताबिक, शहरीकरण के कारण शहर में प्रतिमा बनाने लायक मिट्टी जुटाना बड़ी समस्या बन गई है। ग्रामीण क्षेत्रों से किसी तरह मिट्टी लानी पड़ती है, जिससे कारीगरों की मेहनत और खर्च दोनों बढ़ते हैं।
कारीगरों ने सरकार से कुम्हार समाज के लिए विशेष कल्याणकारी योजना शुरू करने की मांग की है। उनका कहना है कि आर्थिक और संस्थागत सहयोग मिलने पर प्रतिमा निर्माण की परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना आसान होगा। यह काम कुम्हार समाज समेत कई परिवारों की आजीविका से भी जुड़ा है।
झारखंड में पारंपरिक माटी कला के संरक्षण के उद्देश्य से 2017 में माटी कला बोर्ड का गठन किया गया था। इसके माध्यम से जिलों में कुम्हारों को सुविधाएं और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, शुरुआती दौर में कुछ कारीगरों को प्रशिक्षण मिला, लेकिन 2020 के बाद बोर्ड की गतिविधियां लगभग ठप हो गईं। फिलहाल बोर्ड में अध्यक्ष और सदस्य नहीं होने की बात भी सामने आई है।
देवघर के कलाकार मार्कण्डेय जजवाड़े का कहना है कि शहर में कभी स्थानीय कला और पर्वों से जुड़ी रचनात्मक गतिविधियों का मजबूत वातावरण था, लेकिन अब पारंपरिक कला कमजोर हो रही है। देवघर प्रजापति समाज के संरक्षक अवधेश प्रजापति ने भी बोर्ड को दोबारा सुचारू करने की मांग करते हुए सरकार से पत्राचार किए जाने की जानकारी दी है। कारीगरों को उम्मीद है कि बोर्ड सक्रिय होने पर प्रशिक्षण, संसाधन और आजीविका से जुड़ी उनकी समस्याओं पर संस्थागत स्तर पर पहल हो सकेगी।