धनबाद स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद का 85वां स्थापना दिवस समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और खनन क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने सुरक्षित और अधिक सक्षम खनन के लिए स्मार्ट माइनिंग तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों की संभावनाओं को प्रमुखता से रखा।
संस्थान के निदेशक प्रो. एके मिश्रा ने देश के वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास में सीएसआईआर की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने बुनियादी एवं अनुप्रयुक्त अनुसंधान, तकनीकी विकास और उद्योग व सरकार को वैज्ञानिक सहयोग देने में परिषद के योगदान की जानकारी दी। समारोह में सीएसआईआर और सीएसआईआर-सिम्फर की उपलब्धियों पर आधारित वीडियो भी दिखाए गए।
कार्यक्रम में सीएमपीडीआई के सीएमडी चौधरी शिव राज सिंह ने खनन से संबंधित आंकड़ों का व्यवस्थित संग्रह कर व्यापक डेटा बैंक तैयार करने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, इस डेटा का उपयोग स्मार्ट माइनिंग और एआई आधारित तकनीक विकसित करने में किया जा सकता है। उन्होंने खान सुरक्षा और उत्पादन क्षमता के लिए एआई मॉडल तैयार करने तथा अकादमिक संस्थानों, शोध संस्थानों और उद्योगों के बीच समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया।
डीजीएमएस के महानिदेशक रविंद्र टी. मांडेकर ने खान सुरक्षा और तकनीकी विकास में सीएसआईआर-सिम्फर के योगदान की चर्चा की। उन्होंने सुरक्षित खनन पद्धतियों, कर्मचारियों के प्रशिक्षण और कौशल उन्नयन के साथ ओपनकास्ट खदानों में एआई के इस्तेमाल की संभावनाएं बताईं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं को ध्यान में रखने की जरूरत भी रेखांकित की गई।
समारोह के दौरान सीएसआईआर-सिम्फर और सीएमपीडीआई, रांची के बीच कोयला गैसीकरण में वैज्ञानिक सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन हुआ। इसके अंतर्गत संयुक्त अनुसंधान एवं विकास, तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान और नए तकनीकी समाधानों पर काम किया जाएगा। भारत में कोयला गैसीकरण से जुड़े नए अनुप्रयोगों की संभावनाएं भी सहयोग के दायरे में रहेंगी।
दूसरा समझौता सीएसआईआर-सिम्फर और जीएसआरसी, अहमदाबाद के बीच खनन एवं ईंधन विज्ञान में अनुसंधान सहयोग के लिए किया गया। इसमें कोयला, लिग्नाइट, खदान अपशिष्ट, फ्लाई ऐश और अन्वेषण नमूनों में दुर्लभ मृदा तत्वों तथा महत्वपूर्ण खनिजों के मानचित्रण और आकलन पर ध्यान दिया जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसे संसाधनों की पहचान, संभावित उपयोग और भविष्य के अनुसंधान को आगे बढ़ाना है।