रांची के नगड़ी गांव में अधिग्रहित करीब 2.98 एकड़ जमीन पूर्व मालिकों को लौटाने की मांग वाली याचिका झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने डब्ल्यूपी (सी) संख्या 4590/2014 पर सुनवाई करते हुए कहा कि वैध अधिग्रहण, मुआवजे के भुगतान और भूमि के राज्य में निहित हो जाने के बाद उसकी वापसी का कानूनी आधार नहीं बनता।
यह विवाद 1957-58 में बिरसा कृषि महाविद्यालय की स्थापना के लिए नगड़ी गांव में हुए भूमि अधिग्रहण से संबंधित था। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, उस समय भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत गांव की लगभग 202 एकड़ जमीन ली गई थी। कृष्ण कच्छप समेत अन्य याचिकाकर्ताओं ने इसमें से करीब 2.98 एकड़ जमीन वापस दिलाने की मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष था कि उनके पूर्वजों की भूमि का निर्धारित उद्देश्य के लिए उपयोग नहीं हुआ। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि 1968 और 1970 में कुछ भूमि छोड़ने की सिफारिश की गई थी। उनका दावा था कि पूर्वजों को मुआवजा नहीं मिला, उनका कब्जा बना रहा और उनके नाम से लगान रसीदें जारी होती रहीं।
राज्य सरकार ने इन दावों का विरोध करते हुए कहा कि अधिग्रहण की प्रक्रिया कानून के अनुसार पूरी की गई थी। सरकार की ओर से अदालत में पेश रिकॉर्ड के मुताबिक अवार्ड पारित हुआ था और मूल भू-स्वामियों को मुआवजा दिया गया था। सरकार ने यह भी कहा कि 1957-58 के अधिग्रहण को लेकर याचिका 2014 में दाखिल की गई, यानी मामला करीब 66 वर्ष बाद उठाया गया।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि विवादित भूमि का एक हिस्सा रांची रिंग रोड के निर्माण में इस्तेमाल हो चुका है, जबकि दूसरा हिस्सा राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय को हस्तांतरित किया गया है। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने इस उपयोग के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र भी जारी किया था।
हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिग्रहण और कब्जे की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जमीन राज्य में निहित हो जाती है। मूल सार्वजनिक उद्देश्य पूरा न होने पर भी उसका इस्तेमाल दूसरे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है। अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता मूल अवार्डधारकों के वैध उत्तराधिकारी होने से जुड़े आवश्यक दस्तावेज और वंशावली प्रस्तुत नहीं कर सके। इन आधारों पर हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी गई।