रांची स्थित झारखंड हाई कोर्ट ने रामगढ़ जिले के पतरातू अंचल में आदिवासी जमीन के हस्तांतरण से जुड़े मामले में दायर याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम यानी सीएनटी एक्ट के प्रतिबंधों और निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करके किया गया भूमि हस्तांतरण वैध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने रिवीजन अथॉरिटी के आदेश को सही ठहराया। विवाद घुटवा गांव के खाता संख्या 42 और प्लॉट संख्या 1273 की 0.92 एकड़ जमीन से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह भूमि वर्ष 1970 में पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से खरीदी गई थी और तभी से उनका कब्जा बना हुआ था। हालांकि, उनके नाम पर दाखिल-खारिज नहीं हो सका था।
दूसरे पक्ष ने दावा किया कि उसने इसी प्लॉट की 0.67 एकड़ जमीन वर्ष 2003 में खरीदी थी। खरीद के लिए तत्कालीन उपायुक्त की अनुमति ली गई और बाद में उसके नाम पर म्यूटेशन भी हुआ। उसका कहना था कि जमीन खरीदने के छह महीने के भीतर उसे वहां से बेदखल कर दिया गया, जिसके बाद उसने सीएनटी एक्ट की धारा 46(4-ए) के तहत जमीन वापसी का आवेदन दिया।
याचिकाकर्ताओं ने आवेदन की समय-सीमा और बेदिया समुदाय की जनजातीय स्थिति पर सवाल उठाया था। अदालत ने छह सितंबर 1950 के संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश की अधिसूचना का उल्लेख करते हुए माना कि बिहार के लिए जारी सूची में बेदिया समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में शामिल किया गया था।
अदालत ने कहा कि सीएनटी एक्ट की धारा 46(1) के अनुसार अनुसूचित जनजाति के रैयत की जमीन का दूसरे अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को हस्तांतरण भी तय शर्तों और उपायुक्त की पूर्व अनुमति से ही किया जा सकता है। धारा 46(3) के तहत कानून के विरुद्ध हुआ हस्तांतरण किसी अदालत में वैध नहीं माना जाएगा।
हाई कोर्ट ने यह भी माना कि वर्ष 2003 में जमीन खरीदने वाले पक्ष को छह महीने के भीतर बेदखल किया गया था। इस आधार पर जमीन वापसी के आवेदन में धारा 46(4-ए)(a) की 12 वर्ष वाली समय-सीमा बाधा नहीं बनी। इन निष्कर्षों के साथ अदालत ने संबंधित याचिका खारिज कर दी।