पश्चिमी सिंहभूम उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी को 1.32 लाख रुपये चुकाने का दिया आदेश

चाईबासा में जिला उपभोक्ता आयोग ने स्वास्थ्य बीमा दावा नहीं चुकाने के मामले में शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। कंपनी को दावा राशि, मानसिक परेशानी की भरपाई और वाद व्यय का भुगतान 45 दिनों में करना होगा।

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चाईबासा में स्वास्थ्य बीमा दावे पर पश्चिमी सिंहभूम उपभोक्ता आयोग का फैसला

चाईबासा स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, पश्चिमी सिंहभूम ने स्वास्थ्य बीमा दावा नहीं चुकाने से जुड़े एक मामले में शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला दिया है। आयोग ने एसबीआई जनरल इंश्योरेंस को कुल 1,32,572 रुपये का भुगतान 45 दिनों के भीतर करने का आदेश दिया है। निर्धारित अवधि में राशि नहीं देने पर आदेश के अनुसार नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा।

यह फैसला सीसी केस संख्या 28/2025 में 2 सितंबर 2026 को सुनाया गया। मामला महेंद्र रजक की पत्नी कलावती देवी के इलाज पर खर्च हुए 82,572 रुपये के बीमा दावे से संबंधित था। शिकायतकर्ता वर्तमान में चाईबासा पुलिस लाइन में रहते हैं और उन्होंने अपने परिवार के लिए आरोग्य प्लस स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी।

उपलब्ध विवरण के अनुसार पॉलिसी 13 फरवरी 2024 से 12 फरवरी 2025 तक प्रभावी थी। इसी अवधि में कलावती देवी को 16 से 22 अक्टूबर 2024 के बीच गुरुनानक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में भर्ती कराया गया था। इलाज पर 82,572 रुपये खर्च हुए। शिकायतकर्ता का कहना था कि जरूरी दस्तावेज और चिकित्सा बिल देने के बावजूद भुगतान नहीं हुआ।

बीमा कंपनी ने आयोग के समक्ष कहा कि शिकायतकर्ता ने उसके पास कोई दावा दर्ज नहीं कराया था और तय प्रक्रिया पूरी होने से पहले शिकायत दाखिल की गई। आयोग ने यह दलील स्वीकार नहीं की। उसके सामने 18 अक्टूबर 2024 का वह पत्र भी रखा गया था, जिसमें अस्पताल को कैशलेस सुविधा देने में असमर्थता बताई गई थी।

आयोग ने माना कि कंपनी को कैशलेस सुविधा से जुड़े अनुरोध की जानकारी थी और मामले में दावा संख्या का उल्लेख भी सामने आया। आयोग के अनुसार कंपनी अपने रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक हिस्ट्री और संबंधित दस्तावेज पेश करके स्थिति स्पष्ट कर सकती थी, लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर दावे का उचित परीक्षण कर कारण सहित निर्णय नहीं दिया गया। इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में कमी माना गया।

आदेश में 82,572 रुपये की दावा राशि के साथ मानसिक पीड़ा और परेशानी के लिए 40 हजार रुपये तथा वाद व्यय के रूप में 10 हजार रुपये देने को कहा गया है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि अस्पताल का पूरा बिल बिना जांच स्वतः देय नहीं माना जा सकता, लेकिन बीमा कंपनी को प्राप्त दावे का निष्पक्ष, पारदर्शी और नियमों के अनुरूप मूल्यांकन कर उपभोक्ता को निर्णय बताना आवश्यक है।