पालकोट में 261 साल पुरानी दुर्गा पूजा संजोए है नागवंशी विरासत

गुमला जिले के पालकोट में दुर्गा पूजा की परंपरा नागवंशी शासन की विरासत से जुड़ी है। यहां का प्राचीन दशभुजी मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।

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गुमला के पालकोट की प्राचीन दुर्गा पूजा और नागवंशी विरासत

गुमला जिले का पालकोट क्षेत्र अपनी प्राचीन धार्मिक परंपराओं और नागवंशी राजाओं से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत के लिए जाना जाता है। प्रकाशित विवरण के मुताबिक, यहां दुर्गा पूजा की परंपरा करीब 261 वर्षों से चली आ रही है। पालकोट का दशभुजी मंदिर इस परंपरा का प्रमुख केंद्र है और आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आस्था इससे जुड़ी हुई है।

उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण में पालकोट की दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1765 में नागवंशी महाराजा यदुनाथ शाह द्वारा कराए जाने का उल्लेख है। इसके बाद राजवंश के उत्तराधिकारियों ने पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाया। इस क्रम में विश्वनाथ शाह, उदयनाथ शाह, श्यामसुंदर शाह, बेलीराम शाह और मुनीनाथ शाह समेत कई नागवंशी शासकों के नाम दर्ज हैं।

परंपरा को जारी रखने वाले शासकों में धृतनाथ शाहदेव, देवनाथ शाहदेव, गोविंद शाहदेव और जगरनाथ शाहदेव का भी उल्लेख मिलता है। इस लंबे क्रम के कारण पालकोट की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह क्षेत्र के इतिहास और नागवंशी शासन की सांस्कृतिक स्मृति से भी जुड़ गई।

विवरण के अनुसार, शुरुआती दौर में दशभुजी मंदिर के पास भैंस की बलि देने की प्रथा थी। बाद में कंदर्पनाथ शाहदेव के राजा बनने पर इसे समाप्त कर दिया गया। इस बदलाव को स्थानीय परंपरा में अहिंसा और करुणा के संदेश से जोड़कर देखा जाता है। मंदिर अपनी प्राचीनता और भव्य स्वरूप के कारण भी क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखता है।

पालकोट के बारे में रामायण काल से जुड़े प्रसंगों और निशानियों की स्थानीय मान्यताएं भी प्रचलित हैं। इन्हीं मान्यताओं, नागवंशी विरासत और सदियों पुरानी शक्ति-उपासना की परंपरा ने इस क्षेत्र को धार्मिक तथा ऐतिहासिक महत्व दिया है। अलग-अलग कालखंडों से जुड़ी स्मृतियां यहां की सांस्कृतिक पहचान को आज भी जीवित रखती हैं।

दुर्गा पूजा के दौरान यह विरासत फिर प्रमुखता से सामने आती है। दशभुजी मंदिर और उससे जुड़ी परंपराएं श्रद्धालुओं के लिए उपासना का केंद्र होने के साथ पालकोट के लंबे इतिहास की झलक भी प्रस्तुत करती हैं। पीढ़ियों से चली आ रही पूजा इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय धार्मिक परंपराएं किस तरह किसी क्षेत्र के इतिहास और सामूहिक स्मृति को सहेजती हैं।