बिनोद बिहारी महतो की जयंती पर झारखंड आंदोलन और शिक्षा में उनके योगदान का स्मरण

धनबाद में बिनोद बिहारी महतो की जयंती पर उनके सामाजिक सुधार, शिक्षा और अलग झारखंड राज्य के आंदोलन में योगदान को याद किया जा रहा है।

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झारखंड आंदोलन के नेता और समाज सुधारक बिनोद बिहारी महतो की जयंती पर स्मरण

धनबाद जिले में बुधवार को झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल बिनोद बिहारी महतो की जयंती पर उनके सामाजिक और राजनीतिक योगदान को याद किया जा रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक अध्यक्ष रहे महतो ने शिक्षा, समाज सुधार और अलग झारखंड राज्य के आंदोलन को अपने सार्वजनिक जीवन का प्रमुख आधार बनाया था।

बिनोद बिहारी महतो का जन्म 23 सितंबर 1923 को धनबाद जिले के बलियापुर प्रखंड स्थित बड़ादाहा गांव में हुआ था। उनका जीवन ऐसे दौर में आगे बढ़ा, जब पारिवारिक आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनके लिए पढ़ाई जारी रखना आसान नहीं था। परिस्थितियों के चलते उन्हें आगे की शिक्षा छोड़कर धनबाद न्यायालय में दैनिक मजदूर के रूप में काम शुरू करना पड़ा।

बाद में उन्हें समाहरणालय के आपूर्ति विभाग में किरानी की नौकरी मिली। नौकरी के दौरान एक वकील की टिप्पणी ने उन्हें स्वयं कानून की पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की और धनबाद न्यायालय में वकालत शुरू की। आगे चलकर उन्होंने सिविल मामलों के अधिवक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई।

महतो शिक्षा को सामाजिक बदलाव का प्रभावी माध्यम मानते थे। इसी सोच के तहत उन्होंने कई स्कूल और कॉलेज खुलवाने में भूमिका निभाई तथा लोगों को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। उनके सामाजिक कार्यों में शिक्षा के प्रसार के साथ समुदायों को संगठित करने और सुधार की दिशा में आगे बढ़ाने पर जोर रहा।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग से जुड़े आंदोलन को दिशा देने का काम किया। उनकी पहचान केवल राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि समाज सुधारक और शिक्षा समर्थक के तौर पर भी बनी। जयंती का अवसर उनके संघर्षपूर्ण जीवन, सार्वजनिक भूमिका और झारखंड के सामाजिक विकास से जुड़े विचारों को स्मरण करने का दिन है।