लातेहार जिले के बेतला नेशनल पार्क में गौर, जिन्हें आम तौर पर बाइसन भी कहा जाता है, की घटती आबादी को लेकर चिंता जताई गई है। राज्य वन्यजीव बोर्ड के पूर्व सदस्य डॉ. डीएस श्रीवास्तव के अनुसार, बेतला अब झारखंड में गौर की आखिरी प्रमुख आबादी वाले क्षेत्रों में शामिल है, लेकिन यहां भी उनकी संख्या तेजी से कम हो रही है।
डॉ. श्रीवास्तव ने इस स्थिति के पीछे मानवीय हस्तक्षेप और घरेलू मवेशियों के बढ़ते दबाव को प्रमुख चुनौती बताया है। उनका दावा है कि पलामू टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में मवेशी जंगल में चरने पहुंचते हैं। इससे गौर के प्राकृतिक चरागाह प्रभावित होने के साथ उनके लिए भोजन की उपलब्धता घटने का खतरा है।
विशेषज्ञ के मुताबिक घरेलू मवेशियों की मौजूदगी से जंगली जीवों तक संक्रामक रोग पहुंचने की आशंका भी बनी रहती है। उन्होंने खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियों का उल्लेख करते हुए रिजर्व से जुड़े गांवों के मवेशियों का शत-प्रतिशत टीकाकरण कराने पर जोर दिया। इससे जंगली गौर और पालतू पशुओं के बीच रोग फैलने का जोखिम कम किया जा सकता है।
गौर की आबादी का सीमित क्षेत्र में सिमटना भी चिंता का विषय बताया गया है। डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार, अलग-अलग झुंडों के बीच संपर्क घटने से अंतःप्रजनन बढ़ सकता है और आनुवंशिक विविधता प्रभावित हो सकती है। इसका असर आने वाली पीढ़ियों की शारीरिक क्षमता तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ने की आशंका है।
वन विभाग की ओर से मध्य प्रदेश से नए गौर लाकर आनुवंशिक विविधता बढ़ाने के प्रयास को उन्होंने उपयोगी कदम बताया, लेकिन साथ ही कहा कि केवल बाहर से नए जीव लाना स्थायी समाधान नहीं होगा। इसके लिए बेतला के कोर क्षेत्र में घरेलू मवेशियों की चराई रोकने और प्राकृतिक घास के मैदानों को सुरक्षित रखने की जरूरत है।
उन्होंने स्थानीय गौर की मौजूदा आबादी की नियमित निगरानी, स्वच्छ पानी और पर्याप्त भोजन की उपलब्धता तथा प्राकृतिक गलियारों के संरक्षण को प्राथमिकता देने की बात कही। उनके अनुसार, नए और स्थानीय गौर का मेल तभी प्रभावी हो सकेगा, जब जमीनी स्तर पर आवास संकट और मवेशियों के दबाव को नियंत्रित करने के ठोस उपाय किए जाएं।