पलामू टाइगर रिजर्व के अंतर्गत बेतला नेशनल पार्क में महुआ की चाय तैयार करने की पहल शुरू हुई है। वन विभाग की योजना इस उत्पाद को ग्रामीण महिलाओं के रोजगार से जोड़ने और महुआ से बनने वाले खाद्य पदार्थों की पहचान बढ़ाने की है। इसके लिए “महुआ कैफे” नाम से एक ब्रांड भी तैयार किया गया है।
योजना के मुताबिक मेदिनीनगर, लातेहार और गढ़वा के शहरी क्षेत्रों में महुआ कैफे खोले जाएंगे। पलामू, गढ़वा और लातेहार के सार्वजनिक स्थानों पर इसके स्टॉल लगाने की भी तैयारी है। इस विस्तार में स्थानीय प्रशासन से सहयोग लेने की बात कही गई है।
महुआ की इस चाय में सामान्य चायपत्ती का इस्तेमाल नहीं होता। इसे बनाने से पहले महुआ को गर्म पानी में उबाला जाता है। फूलने के बाद इसमें गुड़ और इलायची डाली जाती है तथा मिश्रण को कुछ देर और उबाला जाता है। इस प्रक्रिया के लिए महिलाओं को अलग-अलग स्तर पर प्रशिक्षण दिया गया है।
प्रशिक्षण प्राप्त महिलाएं महुआ की चाय तैयार करने और उसकी आपूर्ति से जुड़ रही हैं। पहल का उद्देश्य आगे चलकर अधिक ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का माध्यम विकसित करना है। महुआ से चाय के अलावा बिस्किट, लड्डू, चॉकलेट और कुकीज जैसे उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं।
खाद्य उपयोग के योग्य महुआ जुटाने के लिए ग्रामीणों को विशेष जाल और तय प्रक्रिया की जानकारी दी गई है। जाल के इस्तेमाल से महुआ जमीन पर गिरने से बचता है और उसमें मिट्टी तथा धूल मिलने की आशंका कम होती है। इसी महुआ का उपयोग चाय और दूसरे खाद्य उत्पाद बनाने में किया जाता है।
उपलब्ध विवरण के अनुसार जमीन से चुना गया महुआ बाजार में करीब 35 से 40 रुपये प्रति किलो बिकता है, जबकि तय प्रक्रिया से जुटाए गए खाद्य-ग्रेड महुआ की विभागीय खरीद 70 से 80 रुपये प्रति किलो की दर से होती है। प्रस्तावित कैफे और स्टॉल शुरू होने पर पहल के बाजार और रोजगार संबंधी प्रभाव की तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी।