बोकारो स्टील प्लांट में विस्थापितों का आंदोलन सातवें दिन जारी, 1,500 अप्रेंटिस की बहाली की मांग

बीएसएल में नियोजन की मांग को लेकर विस्थापित अप्रेंटिस संघ का आमरण अनशन जारी है। आंदोलनकारियों ने समाधान नहीं निकलने पर शनिवार को प्रवेश द्वार बंद करने की चेतावनी दी है।

2 मिनट पढ़ें 7 बार पढ़ी गई
बोकारो स्टील प्लांट में नियोजन की मांग को लेकर प्रदर्शन करते विस्थापित

बोकारो स्टील प्लांट में नियोजन की मांग को लेकर विस्थापितों का आंदोलन शुक्रवार को सातवें दिन भी जारी रहा। विस्थापित अप्रेंटिस संघ के सदस्य टू-टैंक गार्डन के पास आमरण अनशन कर रहे हैं। शुक्रवार को प्रदर्शनकारियों ने संयंत्र के कई प्रवेश द्वारों पर आवागमन रोकने की कोशिश की। इससे प्लांट के कामकाज पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है।

आंदोलन की प्रमुख मांग 1,500 विस्थापित अप्रेंटिस प्रशिक्षुओं की बहाली है। प्रदर्शनकारी चतुर्थ वर्ग की नौकरियों में पुरानी आरक्षण व्यवस्था लागू करने और विस्थापित परिवारों के लिए स्पष्ट नियोजन नीति बनाने की भी मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद भी नियमित रोजगार नहीं मिलने से युवाओं के सामने आर्थिक संकट बना हुआ है।

प्रदर्शन में शामिल लोगों का तर्क है कि जिन परिवारों ने बोकारो स्टील प्लांट की स्थापना के लिए जमीन दी थी, उनके युवाओं को रोजगार मिलना चाहिए। वे ठेका आधारित काम के बजाय नियमित नौकरी चाहते हैं। इन मांगों को लेकर विभिन्न संगठनों के एक मंच पर आने से आंदोलन का दायरा बढ़ा है।

विस्थापित नेता रघुनाथ महतो ने कहा है कि जल्द समाधान नहीं निकला तो शनिवार को प्लांट के मुख्य द्वार सहित अन्य प्रवेश द्वार भी बंद किए जाएंगे। आंदोलनकारियों की इस चेतावनी के बाद अब बीएसएल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन की अगली पहल पर नजर है। प्रवेश द्वार बंद होने की स्थिति में संयंत्र की गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

बोकारो विधायक श्वेता सिंह के अनुसार, आंदोलनकारियों का आरोप है कि उन्हें पिछले डेढ़ वर्ष से केवल आश्वासन मिलता रहा है। विधायक ने भी प्रबंधन की प्रतिबद्धताओं के पूरा नहीं होने की बात कही है। हालांकि उपलब्ध विवरण में बीएसएल प्रबंधन या प्रशासन की ओर से आंदोलनकारियों की मांगों पर कोई ताजा औपचारिक प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है।

फिलहाल अनशन और गेटों पर प्रदर्शन जारी रहने से मामला संवेदनशील बना हुआ है। आंदोलनकारी नियोजन से जुड़ी मांगों पर ठोस निर्णय चाहते हैं, जबकि संभावित गेटबंदी से पहले बातचीत के जरिए समाधान की आवश्यकता बढ़ गई है। आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रबंधन, प्रशासन और आंदोलनकारी पक्ष के बीच वार्ता होती है या नहीं।