झारखंड हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए व्यक्ति को बरी करते हुए निचली अदालत की प्रक्रिया में गंभीर खामियां बताई हैं। न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा कि आरोपी से उसकी समझ में आने वाली भाषा में प्रश्न नहीं किए जाने के कारण उसे अपने विरुद्ध पेश साक्ष्यों पर उचित सफाई देने का अवसर नहीं मिला।
अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर पाया कि अपीलकर्ता निरक्षर ग्रामीण था, जबकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत उसके प्रश्न और उत्तर केवल अंग्रेजी में दर्ज किए गए थे। रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं था कि प्रश्नों का उसकी मातृभाषा में अनुवाद कर उसे समझाया गया था। खंडपीठ के अनुसार, भाषा की बाधा होने पर अनुवादक की व्यवस्था की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने बयान दर्ज करने की तारीखों से जुड़ी विसंगति पर भी गौर किया। आरोपी की परीक्षा 22 जुलाई 2016 को दर्ज हुई थी, लेकिन बिजली कटौती का उल्लेख करते हुए उसका अंगूठा निशान अगले दिन लिया गया। दूसरी ओर, संबंधित कागजात पर न्यायाधीश के हस्ताक्षर 22 जुलाई की तारीख में ही दर्ज थे।
खंडपीठ ने माना कि धारा 313 की प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं है। इसका उद्देश्य आरोपी को उसके खिलाफ आए साक्ष्यों पर अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर देना है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से जोड़ा और कहा कि गंभीर प्रक्रियागत गड़बड़ी बरी किए जाने का आधार बन सकती है।
मामला रांची की निचली अदालत के 25 अप्रैल 2018 के फैसले से संबंधित था। उस अदालत ने चमरा उरांव को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराकर आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अभियोजन का आरोप था कि 26 फरवरी 2009 को भूमि विवाद के कारण प्रमेश्वरी देवी को कुएं में डुबोकर मार दिया गया था।
हाईकोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड और बयान दर्ज करने की प्रक्रिया में मिली खामियों पर विचार करने के बाद निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया। इसके साथ ही चमरा उरांव को मामले में बरी करने का आदेश दिया गया। यह निर्णय आपराधिक मुकदमों में आरोपी को प्रश्न समझाने और उसकी भाषा में जवाब देने का प्रभावी अवसर सुनिश्चित करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।