मनरेगा राशि के कथित दुरुपयोग मामले में पूर्व ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर की याचिका खारिज

मांडर की एक मनरेगा योजना से जुड़े मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने पूर्व ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर निचली अदालत का आदेश बरकरार रखा।

2 मिनट पढ़ें 6 बार पढ़ी गई
रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट भवन की प्रतिनिधि तस्वीर

रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने मांडर की एक मनरेगा योजना में 3,11,244 रुपये के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामले में तत्कालीन ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर सुष्मिता प्रिया उर्फ सुष्मिता गुप्ता को राहत देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय की अदालत ने उनकी आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।

मामला लाभुक जलेश्वर लोहरा की जमीन पर ट्यूबवेल निर्माण के लिए स्वीकृत राशि से संबंधित है। आरोप है कि निर्माण निर्धारित लाभुक की जमीन पर नहीं किया गया और राशि का दुरुपयोग हुआ। उप विकास आयुक्त कार्यालय के तीन जनवरी 2018 के पत्र के आधार पर जांच के बाद मांडर थाना में 2018 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

पुलिस ने जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र दाखिल किया था। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 406, 420 और 409 के तहत संज्ञान लिया। याचिकाकर्ता ने मुकदमे से मुक्त करने के लिए डिस्चार्ज आवेदन दिया था, जिसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि याचिकाकर्ता मार्च 2010 से सितंबर 2012 तक संविदा पर ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर थीं और निर्माण में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। यह भी दलील दी गई कि जमीन की पहचान, सत्यापन, स्थल निरीक्षण और भुगतान की प्रक्रिया में अन्य कर्मियों की भी जिम्मेदारियां थीं।

राज्य की ओर से कहा गया कि ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर के पद पर रहते हुए परियोजना की निगरानी करना याचिकाकर्ता के दायित्व में शामिल था। अदालत ने केस डायरी और 30 दिसंबर 2016 की संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट पर विचार किया। आदेश में उपलब्ध सामग्री और गवाहों के बयानों को इस चरण में महत्वपूर्ण माना गया।

हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखने के बाद डिस्चार्ज आवेदन पर निर्णय दिया था। उस आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं मिलने पर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई। अदालत ने लंबित अंतरिम आवेदन को भी बंद कर दिया। यह निर्णय आरोपों पर अंतिम दोषसिद्धि नहीं, बल्कि मुकदमे से मुक्त करने की मांग पर दिया गया है।