महेशपुर में दशहरा पर निभाई गई आदिवासी समुदाय की पारंपरिक ‘दशाए प्रथा’

पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ निकली टोलियों ने भिक्षाटन किया। जुटी सामग्री से गांव में पूजा और प्रसाद वितरण किया जाएगा।

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महेशपुर में दशाए प्रथा के दौरान पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य करते आदिवासी समुदाय के लोग

पाकुड़ जिले के महेशपुर प्रखंड मुख्यालय और आसपास के गांवों में आदिवासी समुदाय ने विजयादशमी के अवसर पर अपनी पारंपरिक ‘दशाए प्रथा’ निभाई। समुदाय के लोग अलग-अलग टोलियों में निकले और नृत्य-संगीत के साथ इस पौराणिक परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके सामूहिक आयोजन ने दशहरा उत्सव में स्थानीय संस्कृति का विशिष्ट रंग जोड़ा।

दशाए प्रथा में शामिल लोगों ने धोती, साड़ी, लुंगी और पंछी जैसे पारंपरिक वस्त्र पहने थे। कई प्रतिभागियों ने माथे पर पगड़ी बांध रखी थी। हाथों में पारंपरिक वाद्ययंत्र लेकर वे बस्तियों और गांवों में घूमे तथा नाचते-गाते हुए भिक्षाटन किया। इस दौरान स्थानीय लोगों से पैसा, अनाज और सब्जियां एकत्र की गईं।

समुदाय के लोगों के अनुसार, यह गतिविधि केवल विजयादशमी तक सीमित एक दिन का कार्यक्रम नहीं है। इसकी शुरुआत नवरात्र में कलश स्थापना के दिन से हो जाती है और दशहरा तक अलग-अलग इलाकों में टोलियां भ्रमण करती हैं। इस अवधि में मिली सामग्री को सामुदायिक धार्मिक आयोजन के लिए सुरक्षित रखा जाता है।

दशहरा संपन्न होने के बाद एकत्र धन और खाद्य सामग्री से गांव में पारंपरिक पूजा-पाठ आयोजित किया जाता है। इसी सामग्री से प्रसाद तैयार कर लोगों के बीच बांटने की परंपरा भी है। इस तरह दशाए प्रथा में धार्मिक अनुष्ठान के साथ सामूहिक भागीदारी और उपलब्ध संसाधनों को साझा करने की व्यवस्था जुड़ी हुई है।

ग्रामीणों ने बताया कि इस परंपरा का उद्देश्य गांव में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना करना है। समुदाय के लोग अनुष्ठान के माध्यम से सभी के निरोग रहने की प्रार्थना भी करते हैं। उनकी पारंपरिक मान्यता है कि इससे दूषित आत्माओं और प्रतिकूल हवा को गांव की सीमा में प्रवेश करने से रोका जा सकता है।

प्राकृतिक आपदाओं और महामारी से गांव की रक्षा की कामना भी इस अनुष्ठान का हिस्सा बताई गई। महेशपुर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक पहनावे, वाद्ययंत्र, नृत्य और सामूहिक भ्रमण के जरिये समुदाय ने पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया।