रांची के आदिवासी एकता महाजुटान में परिसीमन और सरना कोड समेत पांच प्रस्ताव पारित

मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, जमीन, खनन, ग्रामसभा और अलग सरना कोड से जुड़े प्रस्ताव पारित किए गए।

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रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में शामिल लोग

रांची के मोरहाबादी मैदान में रविवार को आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में हजारों लोग शामिल हुए। कार्यक्रम के मंच से परिसीमन के साथ आदिवासी पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जल-जंगल-जमीन से जुड़े विषय उठाए गए। महाजुटान में इन मुद्दों पर कुल पांच प्रस्ताव पारित किए गए।

पहले प्रस्ताव में मांग की गई कि भविष्य में लोकसभा और विधानसभा की सीटों की संख्या बढ़ने पर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें भी उसी अनुपात में बढ़ाई जाएं। सभा में मौजूद नेताओं ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों अथवा उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व में किसी प्रकार की कमी स्वीकार नहीं की जाएगी।

कार्यक्रम में खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन कानून को वापस लेने की मांग भी रखी गई। प्रस्ताव में कहा गया कि इस कानून से राज्यों की राजकोषीय स्वतंत्रता और विधायी अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा सीएनटी-एसपीटी कानूनों का उल्लंघन कर कथित रूप से हस्तांतरित आदिवासी जमीन मूल रैयतों को लौटाने की मांग उठी।

एक अन्य प्रस्ताव में पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में ग्रामसभा की सहमति के बिना खनन, भूमि अधिग्रहण और विस्थापन नहीं करने की मांग की गई। सभा ने पेसा और वन अधिकार कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने पर भी जोर दिया। जनगणना प्रपत्र में सरना धर्म के लिए अलग कॉलम उपलब्ध कराने की मांग पांचवें प्रस्ताव का हिस्सा रही।

प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने कहा कि उनकी पार्टी झारखंड में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों को घटने नहीं देगी। उन्होंने बताया कि परिसीमन के विषय पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से चर्चा हुई है। राजू ने भाजपा पर आदिवासी हितों के विरुद्ध काम करने का आरोप भी लगाया। यह आरोप उनका राजनीतिक वक्तव्य है।

पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने परिसीमन को केवल सीटों की संख्या का विषय न बताते हुए इसे आदिवासियों के राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों से जोड़ा। कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने कार्यक्रम में राहुल गांधी का संदेश पढ़ा, जिसमें आदिवासी अधिकारों, पहचान, सम्मान तथा प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर दिया गया।