रांची के बोड़ेया स्थित ऐतिहासिक मदन मोहन मंदिर में जन्माष्टमी पर विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कृष्ण मंदिर के नाम से भी पहचाने जाने वाले इस मंदिर में भगवान मदन मोहन का श्रृंगार, अभिषेक, झूलन, जन्मोत्सव और विशेष आरती कार्यक्रम का हिस्सा हैं। मंदिर परिसर में जागरण भी हो रहा है। आयोजन में रांची के साथ झारखंड के दूसरे क्षेत्रों तथा पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से श्रद्धालुओं के पहुंचने की जानकारी दी गई है।
मंदिर में मौजूद शिलालेख के अनुसार इसकी नींव संवत 1722, यानी वर्ष 1665 में वैशाख शुक्ल दशमी को रखी गई थी। उस समय नागवंशी राजा रघुनाथ शाह उपस्थित थे और स्थानीय जमींदार लक्ष्मी नारायण तिवारी ने निर्माण की शुरुआत कराई थी। करीब तीन वर्ष और तीन महीने बाद मंदिर की चहारदीवारी तथा मुख्य द्वारों का काम शुरू हुआ। उपलब्ध विवरण में वर्ष 1682 में निर्माण पूरा होने और इसकी लागत 14,001 रुपये होने का उल्लेख है।
मदन मोहन मंदिर की बनावट में उत्तर-मध्यकालीन भारतीय और मुगलकालीन स्थापत्य के तत्व दिखाई देते हैं। करीब 1,140 वर्ग फीट के चबूतरे पर निर्मित मुख्य मंदिर 12 नक्काशीदार ग्रेनाइट स्तंभों पर टिका है। विवरण के मुताबिक, स्तंभों की ऊंचाई चबूतरे से छत तक लगभग 11 फीट 9 इंच है, जबकि मंदिर के चारों ओर लगभग 3 फीट 5 इंच मोटी दीवार है।
मंदिर की प्रतिमाओं का इतिहास भी कई बदलावों से गुजरा है। यहां पहले राधा और भगवान मदन मोहन की अष्टधातु प्रतिमाएं थीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार भगवान कृष्ण की मूल प्रतिमा 5 सितंबर 1953 को चोरी हो गई थी। वर्ष 1960 में गंगा प्रसाद बुधिया के सहयोग से संगमरमर की नई प्रतिमाएं लगाई गईं। इसके बाद 1980 में वैष्णव परंपरा के अनुसार पीतल की प्रतिमाओं की स्थापना हुई, जिनकी वर्तमान में पूजा की जाती है।
गर्भगृह से एक विशिष्ट पारिवारिक परंपरा भी जुड़ी है। सामान्य श्रद्धालुओं को गर्भगृह में प्रवेश नहीं दिया जाता और वहां नियमित पूजा मुख्य पुजारी करते हैं। लक्ष्मी नारायण तिवारी के वंशज परिवार में विवाह के दौरान नवविवाहित वर-वधू को एक विशेष रस्म के लिए भीतर जाने की अनुमति मिलती है। इस रस्म में वधू राधारानी को सिंदूर अर्पित करती है।
मंदिर की प्राचीन जल निकासी व्यवस्था भी उल्लेखनीय बताई गई है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, छत का वर्षाजल पाइपों के माध्यम से जमीन के भीतर पहुंचाने की व्यवस्था है। इसे भूजल पुनर्भरण से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ ऐसी स्थापत्य विशेषताएं इस मंदिर को रांची की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण स्थलों में शामिल करती हैं।