रांची के मोरहाबादी में आयोजित बैठक में झारखंड के आदिवासी प्रतिनिधियों ने ‘आदिवासी लोकतांत्रिक अधिकार मोर्चा’ के गठन का फैसला किया है। पूर्व मंत्री बंधु तिर्की की पहल पर हुई इस बैठक में राज्य के 20 जिलों से प्रतिनिधि शामिल हुए। नवगठित संगठन ने संभावित परिसीमन के दौरान अनुसूचित जनजाति के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षित सीटों का मौजूदा अनुपात बनाए रखने की मांग उठाई है।
बैठक में तय किया गया कि मोर्चा आरक्षित लोकसभा और विधानसभा सीटों में संभावित कटौती के विरोध में अभियान चलाएगा। संगठन के प्रतिनिधि अपनी मांगों को लेकर राज्यपाल, नेता प्रतिपक्ष और राज्य के सभी सांसदों से मुलाकात करने की योजना बना रहे हैं। यह पहल परिसीमन से जुड़ी आशंकाओं को निर्वाचित प्रतिनिधियों और संवैधानिक पदाधिकारियों के सामने रखने के उद्देश्य से की जाएगी।
मोर्चा ने दशहरा के बाद झारखंड के सभी जिलों में जनजागरण बैठकें आयोजित करने का निर्णय भी लिया है। संगठन के अनुसार, इन बैठकों में लोगों को संभावित परिसीमन और उससे अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकने वाले प्रभाव की जानकारी दी जाएगी। इसके लिए राज्यव्यापी रणनीति तैयार करने पर सहमति बनी है।
बैठक में बंधु तिर्की ने वर्ष 2007 की परिसीमन प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित एक लोकसभा और छह विधानसभा सीटें कम होने की स्थिति बनी थी। उनके मुताबिक विरोध के बाद वह प्रक्रिया रुक गई थी। उन्होंने केवल जनसंख्या को आधार बनाने पर आपत्ति जताई और कहा कि इससे आदिवासी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है।
नए मोर्चे ने शुरुआती सांगठनिक व्यवस्था भी बनाई है। शशि पन्ना और लक्ष्मी नारायण मुंडा को मुख्य प्रवक्ता मनोनीत किया गया है। इसके साथ ही विभिन्न जिलों की भागीदारी वाली कार्यवाहक समिति गठित की गई। रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा और सिमडेगा सहित कई जिलों के सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसमें जिम्मेदारी दी गई है।
समिति में हजारीबाग, चतरा, रामगढ़, गढ़वा, पलामू, लातेहार, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, बोकारो और संताल परगना के जिलों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है। मोर्चे की आगे की गतिविधियों का केंद्र जनप्रतिनिधियों से संवाद, जिलास्तरीय बैठकें और आरक्षण का वर्तमान अनुपात बनाए रखने की मांग होगी।