रांची में करम पर्व का उल्लास, मांदर और लोकगीतों के बीच हुई प्रकृति की पूजा

रांची में करम पर्व श्रद्धा और उत्साह से मनाया जा रहा है। पारंपरिक गीत-नृत्य, करम डाल और जावा के साथ प्रकृति, कृषि तथा भाई-बहन के रिश्ते का सम्मान किया गया।

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रांची में करम पर्व के दौरान पारंपरिक लोकनृत्य और प्रकृति पूजा का आयोजन

रांची में मंगलवार को करम पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। शहर के विभिन्न स्थानों पर मांदर की थाप और पारंपरिक लोकगीतों के बीच लोग उत्सव में शामिल हुए। रांची कॉलेज के दीक्षांत मंडप समेत कई जगह आयोजित पूर्व संध्या कार्यक्रमों में युवाओं ने नागपुरी, मुंडारी, संताली और खड़िया गीतों पर लोकनृत्य प्रस्तुत किया।

झारखंड की लोक परंपरा में करम पर्व प्रकृति, कृषि और सामुदायिक जीवन से जुड़ा है। इसमें करम वृक्ष को कर्म देवता का प्रतीक मानते हुए उसकी डाल स्थापित कर पूजा की जाती है। पर्व के दौरान अच्छी फसल, परिवार की सुख-समृद्धि और भाई-बहन के रिश्ते की मजबूती के लिए प्रार्थना की जाती है।

पर्व की तैयारियां लगभग एक सप्ताह पहले शुरू हो जाती हैं। नदी से लाई गई रेत में जौ, मक्का, गेहूं, चावल, चना, कुल्थी और मसूर के बीज बोए जाते हैं। इनसे उगने वाले अंकुरों को जावा कहा जाता है, जिन्हें नई जिंदगी और उर्वरता के प्रतीक के रूप में पूजा में शामिल किया जाता है।

पूजा के लिए आंगन या अखाड़े में करम वृक्ष की तीन शाखाएं स्थापित करने की परंपरा है। बहनें भाइयों की लंबी उम्र और समृद्धि की कामना के साथ उपवास और विशेष पूजा करती हैं। फसलों की सुरक्षा की परंपरा के तहत धान के खेतों में भेलवा की शाखाएं लगाने का भी उल्लेख मिलता है।

करम पर्व सामाजिक संबंधों को मजबूत करने वाली सहिया परंपरा से भी जुड़ा है। इस अवसर पर निभाई जाने वाली गहरी दोस्ती को पीढ़ियों तक कायम रखने की मान्यता है। सामूहिक करम नृत्य और लोकगीतों के माध्यम से जीवन के अनुभव, प्रेम और सांस्कृतिक स्मृतियां नई पीढ़ी तक पहुंचाई जाती हैं।

उत्सव का केंद्रीय संदेश प्रकृति के सम्मान, श्रम के महत्व और आपसी एकता से जुड़ा है। करम की हरी डाल और जावा के अंकुर के माध्यम से लोग पर्यावरण तथा कृषि पर जीवन की निर्भरता को रेखांकित करते हैं। रांची में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने इसी विरासत को गीत, संगीत और नृत्य के जरिए सामने रखा।