रांची सिविल कोर्ट की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की विशेष अदालत ने जमीन के म्यूटेशन के बदले 700 रुपये रिश्वत लेने के 20 साल से अधिक पुराने मामले में हल्का कर्मचारी भानु प्रताप प्रसाद को दोषी ठहराया है। अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत उसे एक-एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। प्रत्येक धारा में 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
मामला 8 अगस्त 2002 की एसीबी कार्रवाई से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, जमीन का म्यूटेशन करने के एवज में रिश्वत मांगे जाने की शिकायत मिलने के बाद ट्रैप की तैयारी की गई थी। शिकायतकर्ता द्वारा दिए गए 100-100 रुपये के सात नोटों के सीरियल नंबर दर्ज कर उन पर फिनोलफथलीन पाउडर लगाया गया था।
एसीबी की टीम ने कर्मचारी के कार्यालय-सह-निवास पर कार्रवाई की थी। अभियोजन का कहना था कि शिकायतकर्ता से रुपये लेने के बाद कर्मचारी के दोनों हाथ सोडियम कार्बोनेट के घोल में धुलवाए गए और घोल गुलाबी हो गया। इस घोल को सील कर विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया था।
अदालत के सामने पेश फॉरेंसिक रिपोर्ट में घोल में फिनोलफथलीन और सोडियम कार्बोनेट की मौजूदगी की पुष्टि होने की जानकारी दी गई। कार्रवाई के दौरान बरामद 700 रुपये के नोटों के सीरियल नंबर भी ट्रैप से पहले तैयार किए गए रिकॉर्ड से मेल खाने की बात सामने आई। स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में बरामदगी दर्ज की गई थी।
लंबी सुनवाई के दौरान मामले का सूचक और मुख्य गवाह अपने पहले के बयान से मुकर गया था। इसके बावजूद अदालत ने रासायनिक परीक्षण, फॉरेंसिक रिपोर्ट, बरामद नोटों और उनके दर्ज सीरियल नंबरों से संबंधित साक्ष्यों को महत्वपूर्ण माना। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर कर्मचारी को दोषी करार देकर सजा सुनाई गई।
यह फैसला दो दशक से अधिक समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद आया है। मामले में मुख्य गवाह के पलटने के बावजूद अदालत ने उपलब्ध वैज्ञानिक और दस्तावेजी प्रमाणों का मूल्यांकन किया। सजा और जुर्माने का आदेश एसीबी की विशेष अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के अंतर्गत दिया है।