रांची विश्वविद्यालय में नौ भाषाओं के करम गीतों और पारंपरिक नृत्य से सजा महोत्सव

रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के अखड़े में करम पूजा महोत्सव आयोजित हुआ। नौ भाषाओं के गीत, मांदर और लोकनृत्य कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षण रहे।

2 मिनट पढ़ें 4 बार पढ़ी गई
रांची विश्वविद्यालय के अखड़े में करम पूजा महोत्सव के दौरान पारंपरिक नृत्य करते कलाकार

रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के प्रसिद्ध अखड़े में करम पूजा महोत्सव-2026 का आयोजन किया गया। पारंपरिक अनुष्ठान के साथ शुरू हुए कार्यक्रम में झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय संस्कृति के विविध रूप दिखाई दिए। नौ भाषाओं में करम गीतों और लोकनृत्य की प्रस्तुतियां महोत्सव का मुख्य आकर्षण रहीं।

कार्यक्रम में कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने करम डाली की पूजा-अर्चना की। विधि-विधान से डाली स्थापित करने के बाद जावा सजाया गया और उपस्थित लोगों ने पूजा में भाग लिया। इसके बाद लोगों के कानों में जावा फूल लगाने की पारंपरिक रस्म भी निभाई गई, जिससे अखड़ा उत्सव के रंग में नजर आया।

महोत्सव में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग से जुड़ी नौ भाषाओं के गीत-संगीत प्रस्तुत किए गए। पारंपरिक वेशभूषा में कलाकारों ने मांदर की थाप पर लोकनृत्य किया। अलग-अलग भाषाओं में पेश करम गीतों में प्रकृति, खेती-किसानी, भाई-बहन के रिश्ते और सामुदायिक जीवन से जुड़े भाव सामने आए।

कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की भी कलाकारों के साथ पारंपरिक नृत्य में शामिल हुईं। उन्होंने करमा को आदिवासी समाज का महत्वपूर्ण पर्व बताते हुए लोगों को शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम में पर्व को प्रकृति के संरक्षण, भाई-बहन के स्नेह और सामुदायिक एकजुटता से जोड़कर रेखांकित किया गया।

रांची विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सरोज शर्मा, झारखंड ओपन यूनिवर्सिटी के कुलपति तथा कई शिक्षाविद और विभाग से जुड़े लोग भी आयोजन में उपस्थित रहे। अतिथियों ने करमा की सांस्कृतिक परंपरा और महत्व पर चर्चा की। कार्यक्रम के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति और लोक परंपराओं से जोड़ने का संदेश दिया गया।

करम डाली की पूजा, जावा फूल की रस्म, पारंपरिक वेशभूषा और नौ भाषाओं की प्रस्तुतियों ने आयोजन को धार्मिक अनुष्ठान के साथ सांस्कृतिक संरक्षण का मंच भी बनाया। मांदर, गीत और सामूहिक नृत्य के बीच विश्वविद्यालय का अखड़ा देर तक उत्सवमय रहा और झारखंड की भाषाई व लोक-सांस्कृतिक विविधता एक ही परिसर में दिखाई दी।