राजनगर में लाको बोदरा की 107वीं जयंती मनाई गई, वारंगक्षिति में पढ़ाई की उठी मांग

सरायकेला-खरसावां के बीजाडीह में आयोजित जयंती समारोह में पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने आदिवासी पहचान, अधिकार और मातृभाषा में शिक्षा का मुद्दा उठाया।

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सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड की बीजाडीह पंचायत में शनिवार को शिक्षाविद और वारंगक्षिति लिपि के आविष्कारक ओत गुरु कोल लाको बोदरा की 107वीं जयंती मनाई गई। समरसाई चौक पर हुए सादगीपूर्ण कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन सहित जनप्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी।

समारोह में चंपाई सोरेन ने लाको बोदरा के शैक्षणिक और सामाजिक योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि वारंगक्षिति लिपि का आविष्कार आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा तथा सांस्कृतिक पहचान का आधार बना। उनके अनुसार, लाको बोदरा का योगदान केवल हो समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूरे आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने झारखंड के विद्यालयों में वारंगक्षिति लिपि के माध्यम से पढ़ाई नहीं होने पर चिंता जताई। उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा की उपलब्धता को समाज की पहचान से जोड़ते हुए राज्य के स्कूलों में इस दिशा में व्यवस्था किए जाने की जरूरत बताई। कार्यक्रम में भाषा और लिपि के संरक्षण को नई पीढ़ी के भविष्य से भी जोड़ा गया।

चंपाई सोरेन ने अपने संबोधन में जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा तथा आदिवासी अधिकारों का विषय भी उठाया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज लंबे समय से अपनी पहचान और अधिकार बचाने के लिए संघर्ष करता रहा है। उन्होंने इन मुद्दों पर समाज से संगठित रहने की अपील की। ये बातें समारोह में दिए गए उनके संबोधन का हिस्सा थीं।

कार्यक्रम में जिला परिषद अध्यक्ष सोनाराम बोदरा, चंपाई सोरेन के पुत्र सिमल सोरेन, जिला परिषद सदस्य मालती देवगम, सुलेखा हांसदा, मुखिया मोटाय मेलगांडी, राजो टुडू और अमन हांसदा समेत अन्य लोग उपस्थित रहे। सभी ने प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और लाको बोदरा के योगदान को स्मरण किया।