रामगढ़ के बक्शी टोला में प्राचीन मंदिर के संरक्षण का काम शुरू, टेराकोटा पट्टिकाओं पर रामायण के दृश्य

गोला के बक्शी टोला में झाड़ियों और कचरे के बीच मिले प्राचीन मंदिर को एएसआई के संरक्षण में लिया गया है। इसकी स्थापत्य शैली दुमका के मलूटी मंदिर समूह से मिलती-जुलती बताई गई है।

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रामगढ़ के बक्शी टोला में टेराकोटा पट्टिकाओं वाला प्राचीन मंदिर

रामगढ़ जिले के गोला क्षेत्र स्थित बक्शी टोला गांव में मिले एक प्राचीन मंदिर के संरक्षण का काम शुरू किया गया है। राधा गोविंद मंदिर समूह से जुड़े बताए जा रहे इस स्मारक की पहचान वर्ष 2002 में खीरी मठ बौद्ध मंदिर के आसपास हुए सर्वेक्षण के दौरान हुई थी। उस समय यह मंदिर कचरे के ढेर और कंटीली झाड़ियों के नीचे दबा मिला था।

मंदिर की स्थापत्य और टेराकोटा कला दुमका के प्रसिद्ध मलूटी मंदिर समूह से मिलती-जुलती बताई गई है। निर्माण तकनीक और वास्तु शैली के आधार पर इसके 17वीं से 18वीं शताब्दी के बीच निर्मित होने का अनुमान है। अब यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में आ गया है।

मुख्य स्मारक के पास झाड़ियों के बीच एक प्राचीन कुआं और उसी काल से संबंधित मानी जा रही निर्माण सामग्री के दूसरे अवशेष भी मिले हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन अवशेषों से संकेत मिलता है कि खीरी मठ के आसपास कभी एक विस्तृत धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा।

मंदिर की टेराकोटा पट्टिकाओं पर धार्मिक और पौराणिक प्रसंग उकेरे गए हैं। इनमें धनुष-बाण लिए श्रीराम और लक्ष्मण, रावण के साथ युद्ध तथा हनुमान द्वारा द्रोणागिरी पर्वत उठाने के दृश्य शामिल हैं। पट्टिकाओं पर विष्णु के विभिन्न स्वरूप, मत्स्य और वरुण अवतार, चक्र-पद्म अलंकरण तथा अश्वारोही योद्धाओं की आकृतियां भी दिखाई देती हैं।

गर्भगृह का प्रवेश द्वार बहु-मेहराबदार चाप पर आधारित है और उसमें बंगाल की चाला तथा रत्न स्थापत्य शैली का प्रभाव बताया गया है। इसे झारखंड में मलूटी शैली का ऐसा छठा मंदिर माना जा रहा है, जहां रामायण के प्रसंगों वाली टेराकोटा पट्टिकाएं मिली हैं। इससे पहले बोकारो के चंदनकियारी में तीन, रांची के पंडरा में एक और गुमला के नवरत्नगढ़ के पास धोबी मठ में एक ऐसा मंदिर चिह्नित किया गया था।

मंदिर की पहचान और संरक्षण की दिशा में पुरातत्ववेत्ता तथा झारखंड के संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पूर्व उपनिदेशक डॉ. हरेंद्र सिन्हा के लंबे प्रयासों का उल्लेख किया गया है। एएसआई के महानिदेशक डॉ. यदुवीर सिंह रावत और रांची सर्कल की अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. करावी साहा की पहल के बाद संरक्षण कार्य शुरू होने की जानकारी दी गई है।