रिम्स नेत्र संस्थान में 7.70 करोड़ रुपये की सात मशीनों की खरीद दो साल से लंबित

रांची के रिम्स स्थित क्षेत्रीय नेत्र संस्थान में जरूरी उन्नत मशीनें उपलब्ध नहीं होने से रेटिना, ग्लूकोमा और आंखों की कई अन्य जांचों के लिए मरीजों को निजी केंद्रों का रुख करना पड़ रहा है।

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रांची स्थित रिम्स के क्षेत्रीय नेत्र संस्थान का भवन

रांची के राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के क्षेत्रीय नेत्र संस्थान में सात अत्याधुनिक मशीनों की खरीद करीब दो साल से लंबित है। इन उपकरणों की अनुमानित कुल लागत लगभग 7.70 करोड़ रुपये है। मशीनों के अभाव में रेटिना, ग्लूकोमा और आंखों के अंदरूनी हिस्सों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जांचें संस्थान में नहीं हो पा रही हैं।

क्षेत्रीय नेत्र संस्थान का छह मंजिला भवन करीब 85.5 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया है। इसके बावजूद यहां अभी मुख्य रूप से आंखों के पावर, मोतियाबिंद ऑपरेशन और आंख में चोट की जांच की व्यवस्था है। रेटिना, कॉर्निया, एंजियोग्राफी, आंख के अल्ट्रासाउंड और विजुअल फील्ड जैसी उन्नत जांचों के लिए आवश्यक उपकरण उपलब्ध नहीं हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, चिकित्सक प्रतिदिन 80 से अधिक मरीजों को ऐसी जांच कराने की सलाह देते हैं। रिम्स में सुविधा नहीं मिलने के कारण उन्हें निजी जांच केंद्रों में जाना पड़ता है, जहां एक जांच पर करीब तीन हजार रुपये तक खर्च होने की बात कही गई है। सरकारी संस्थान में ये सुविधाएं उपलब्ध होतीं तो मरीजों को जांच का शुल्क नहीं देना पड़ता।

नेत्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील कुमार के अनुसार, भवन तैयार होने के बाद भी जरूरी उपकरणों की कमी से मरीजों को संस्थान का पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। गंभीर और जटिल नेत्र रोगों की जांच बाहर कराने से मरीजों पर अतिरिक्त खर्च पड़ता है। रिपोर्ट मिलने के बाद डॉक्टरों को मरीज का दोबारा आकलन भी करना पड़ता है, जिससे उपचार की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

विशेष परेशानी उन मरीजों को होती है जिन्हें डायबिटिक रेटिनोपैथी, मैक्युला, रेटिना की रक्त नलिकाओं, ऑप्टिक नर्व या ग्लूकोमा से संबंधित समस्या की आशंका पर विस्तृत जांच की जरूरत पड़ती है। बुजुर्ग, गंभीर रोगी और दूर-दराज से आने वाले लोग जांच के लिए अस्पताल से बाहर जाने की अतिरिक्त कठिनाई का सामना करते हैं।

उपकरणों की खरीद के लिए बजट पहले स्वीकृत हो चुका था, लेकिन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। उपलब्ध विवरण के मुताबिक तकनीकी आपत्तियों, फाइलें लौटने और निविदा में देरी के कारण खरीद लंबित रही। एक बार निविदा प्रक्रिया शुरू होने के बाद वित्तीय वर्ष समाप्त होने पर संबंधित राशि रिम्स को वापस भी करनी पड़ी थी।